खुशी की उम्र रखनी हो लंबी ,
मत तारीफ पर जाओ तुम।

अनवरत तुम करो परिश्रम,
लंबी खुशी को पावो तुम।

मिथ्या ही जो करे बड़ाई,
उन पर ना हर्षाओ तुम।

औषधि सा जो कड़वा होवे,
उस पर ही इतराओ तुम।

यह दुनिया तो अजब -गजब है,
इसके खेल निराले हैं।

पेट भरे को भोजन देती,
भूखे के घर लाले हैं।

राहत कोष भरा रहता है,
निर्धन को है ना मिलता।

कोष भरा इसको ले जाता ,
निर्धन के घर ताले हैं।

ओहदे से लोग हाथ मिलाते,
व्यक्ति से ना वो मिलाते हैं,

छोटा ओहदा रिश्ता बड़ा हो,
उससे वो शर्माते हैं।

हंसी-खुशी से जीना है तो ,
ओहदे को ऊपर ले आओ।

मात-पिता भाई -बंधु तुम,
देखो फिर कितना पा जाओ

गया ज़माना जब रिश्ते पे,
अपनी जान गंवाते थे।

कोढ़ स्वरूप जो घर का बंदा था,
उसको भी गले लगाते थे।

समय काल हुआ परिवर्तित,
लोग भी परिवर्तित हैं हुए।

संभ्रांत वर्ग को गले लगाते,
निम्न वर्ग को तजे हुए।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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