एक सही अवलोकन

सुदामा नगर के एक निजी विद्यालय में कक्षा सातवीं में मोहन, सोहन और निजाम नाम के तीन छात्र अध्ययनरत थे। तीनों में अच्छी मित्रता थी। उनकी कक्षा अध्यापिका की मानें तो वो तीनों बच्चे निहायत दर्जे के बदतमीज, असंस्कारी, लापरवाह और पढ़ने में अत्यंत कमज़ोर थे। कुल मिलाकर यदि कहें तो उन बच्चों के अंदर कोई भी ऐसी खूबी नहीं थी जिसकी वज़ह से उनसे कोई प्यार से बात करता या उनसे मित्रता करता।

कोई ऐसा दिन नहीं होता जिस दिन वह बच्चे शरारत न करते और कक्षा अध्यापिका के द्वारा पीटे न जाते। आए दिन कर्मचारी कक्ष में आते ही वो उन तीनों बच्चों की बुराई शुरू कर देतीं। उसी कक्ष में शांभवी मैम भी बैठती थीं। वो उनके मुंँह से हर दिन उन बच्चों की बुराई सुनतीं और सोचतीं क्या सचमुच इतने बुरे बच्चे होंगे। पूरा वर्ष बीत गया किंतु कभी ग़लती से उन बच्चों की तारीफ़ मैम के मुंँह से नहीं सुना।

समय बीतता रहा बच्चे सातवीं कक्षा को पास कर आठवीं कक्षा में आ गए।आठवीं कक्षा की कक्षा अध्यापिका शांभवी मैम थीं। इस क्लास में रामकुमार नाम का एक नया बच्चा भी दाखिला लिया। रामकुमार भी उन्हीं तीन बच्चों का दोस्त बन गया। अभी दो ही तीन दिन क्लास चली थी कि चारो बच्चों की शिकायत दूसरे विषय की शिक्षिका लेकर समन्वयक(को-ऑर्डिनेटर )के पास पहुंँची। उनकी शिकायत थी कि ये चारों कक्षा में गंदी हरकतें करते हैं और दूसरों को भी उन्हीं हरकतों को करने के लिए उकसाते हैं।

एक सही अवलोकन

पांँचवी घंटी चल रही थी शांभवी मैम दूसरी कक्षा में थीं।
उन्हें समन्वयक ने बुलाया और उनसे पूछा, ये चारों आपकी क्लास के बच्चे हैं?
शांभवी मैम-जी।
समन्वयक-कक्षा में इनकी छवि कैसी है?
शांभवी मैम- सॉरी सर, अभी तो मैंने तीन ही दिन क्लास लिया है और अभी मैने ऑब्जर्व नहीं किया है, इसलिए मैं कुछ भी बता नहीं सकती।

इतने में दो-तीन और शिक्षक आ गए और जो नया बच्चा था उससे पूछने लगे क्या हुआ था?

नया बच्चा डर गया और सारी बातों को जस का तस उल्टी कर दिया ।

बस उसके मुंँह से सच्चाई सुनते ही समन्वयक महोदय तो शांत रहे लेकिन जो दूसरे शिक्षक पूछ रहे थे वो सबको पीटना शुरू किए। चार-चार थप्पड़ रशीद किये। तभी समन्वयक महोदय शांभवी मैम को तीन बच्चों को ऑफिस में लेकर जाने को कहे और राम कुमार को थोड़ा डांँट- डपट कर क्लास में जाने को कहे।

मैम तीनों को लेकर ऑफिस में गई और प्रधानाचार्य महोदय को स्थिति से अवगत कराईं। प्रधानाचार्य महोदय की आंँखें फटी की फटी रह गईँ। क्या! कक्षा में तुम लोग ऐसी हरकतें करते हो शर्म नहीं आती तुम लोगों को? कल तुम तीनो अपने पेरेंट्स को लेकर आओगे वरना तुम्हें कक्षा में नहीं जाने दिया जाएगा। वहीं गेट पर रोक दिया जाएगा। तभी एक और शिक्षक आ गए और वो मोहन की वकालत करने लगे।

उन्होंने कहा मैं इसके पेरेंट्स को जानता हूंँ। मैं उन्हें सब बता दूंँगा वगैरह-वगैरह। अत: , मोहन शेर की मांँद से निकल गया । बच गए दो बच्चे उन दोनों को कहा गया कि कल तुम अपने पेरेंट्स को लेकर आओगे वरना क्लास में तुम्हें जाने का पर्मिशन नहीं मिलेगा।

तीन दिन बाद सोहन जो सबसे शरारती बच्चा था वह अपने पेरेंट्स को लेकर आया। उसके पेरेंट्स सारी ग़लती का ज़िम्मा निज़ाम के ऊपर डाल दिए कि निज़ाम के साथ रहकर यह बिगड़ गया है। निजाम ही इसे फ़ोन करता है, मिस गाइड करता है। कुल मिलाकर सोहन के पेरेंट्स का कहना था उनका बच्चा बिल्कुल दूध का धुला हुआ है और सारी बदमाशियांँ निज़ाम ही करता है और यह उसके साथ रहकर थोड़ी बहुत बदमाशियांँ करने लगा है। अतः सोहन को भी कक्षा में जाने की अनुमति मिल गई अब बच गया अकेला निज़ाम।

निज़ाम भी उस दिन स्कूल आया था लेकिन अकेले अतः उसे कक्षा में प्रवेश नहीं मिला वह ऑफिस के बाहर ही बैठा रहा।

फिर से शांभवी मैम को बुलाया गया और प्रधानाचार्य ने कहा कि उहके पेरेंट्स को फ़ोन करके यह कह दीजिए कि वो आकर अपने बच्चे की टी.सी.ले जाएँ क्योंकि इनकी पिछले 2 साल से लगातार शिकायत आ रही है और अब उनकी शिकायतें इस स्तर की हो गई है जिन्हें बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। बेचारा निज़ाम बाहर चुपचाप मुँह लटकाए बैठा हुआ था।

प्रधानाचार्य के इस निर्णय को सुनकर शांभवी मैम भावुक हो गईं। उन्होंने निज़ाम को ऑफिस में बुलाया और पूछा बेटा सच-सच बताओ क्या हुआ है। नहीं तो कल से तुम स्कूल नहीं आ सकोगे। निज़ाम कुछ नहीं बोला बस नीचे सर झुकाया रहा और उसकी आंँखों से एक बार जो अश्रु धारा बहने शुरू हुई तो रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

शांभवी मैंम ने निज़ाम को बाहर भेज दिया और प्रधानाचार्य से कहा, सर अभी मैं इसे अच्छे से नहीं जानती हूंँ। आप मुझे इन चारों बच्चों को समझने का एक महीने का मौका दीजिए एक महीने बाद मैं आपको चारों बच्चों के बारे में सही-सही जानकारी देती हूंँ। तब तक निज़ाम को कक्षा में बैठने की अनुमति दे दीजिए।

प्रधानाचार्य ने कहा मैम इनकी बहुत शिकायत आ चुकी है आप ज़िम्मा लेती हैं। तब शांभवी मैम ने कहा सर में ज़िम्मा तो नहीं ले सकती लेकिन अपनी पूरी कोशिश ज़रूर करूंँगी कि अब शिकायत न आये। शांभवी मैम के अनुरोध पर प्रधानाचार्य ने निज़ाम को कक्षा में बैठने की अनुमति दे दिया।

अगले दिन शांभवी मैम ने निज़ाम को कक्षा के बाहर बुलाया और उससे घटना के बारे में पूछा। निज़ाम ने जो बताया और जो बात ऑफिस में तथा कोऑर्डिनेटर के सामने हुई थी उसमें कोई मैच ही नहीं था। उस घटना में खलनायक निज़ाम घोषित हो गया था ।जबकि वास्तव में मास्टरमाइंड तो सोहन था जिसके पेरेंट्स आकर ऑफिस में लाल- पीले हो रहे थे।

एक सही अवलोकन

शांभवी मैम निज़ाम को बड़े ही प्यार से समझाते हुए बोलीं। बेटा, सारे टीचर्स, प्रिंसिपल सबका कहना है कि तुम्हें स्कूल से निकाल दिया जाए। लेकिन मैने प्रिंसिपल सर से एक महीने का समय लिया है। यह कहकर कि अब तुम्हारी शिकायत नहीं आएगी। तो बेटा, अब अगर तुम कोई भी ग़लती करते हो तो डाँट तुम्हें नहीं मुझे पड़ेगी क्योंकि तुम कोई ग़लती नहीं करोगे इसका जिम्मा मैंने लिया है।

मैम की इस तरह की बात सुनकर निज़ाम की आंखें फिर से डबडबा गईं। वह सिर्फ़ इतना ही बोल पाया कि मैम मैं कोई ग़लती नहीं करूंँगा और इतना कहकर मैम का हाथ पकड़ कर रोने लगा। मैम ने उससे बड़े प्यार से कहा, हांँ बेटा! मुझे विश्वास है कि तुम कोई ग़लती नहीं करोगे। इसलिए तो मैंने ज़िम्मा लिया है।

और अब तुम जाओ, अपना मुंँह धोकर क्लास में जाओ, खुश रहो, अच्छे से पढ़ो- लिखो और सबको दिखा दो कि तुम कितने अच्छे हो। ओके प्रॉमिस, निज़ाम ने मुस्कुराते हुए कहा प्रॉमिस मैम। और मुंँह धोकर कक्षा में चला गया।

सबसे पहले मैम उन चारों को अलग-अलग पढ़ने में अच्छे बच्चों के बगल में बैठाईं।इसके बाद शुरू हुआ मैम का चारों बच्चों को पढ़ने का समय। एक महीने पश्चात मैम इस निष्कर्ष पर पहुंँचीं कि वास्तव में जो निज़ाम कह रहा था वही बात सही थी। सोहन ही सारी शरारतों का जड़ था। हांँ, बाकी तीनों बच्चे भी थोड़े बहुत उसमें शामिल थे लेकिन मास्टरमाइंड सोहन ही था।

चारो बच्चे वहाँ से 12वीं पास करके स्कूल से निकल गए। न कभी मैम ने उन बच्चों से उस घटना के बारे में बातचीत किया और न बच्चे ही किसी भी तरह की ऐसी शरारत किये जिसकी वज़ह से उस घटना को याद करना पड़े। उस दिन के बाद से किसी की भी शिकायत कभी भी ऑफिस तक नहीं पहुंँची। निजाम और सोहन पढ़ने में बहुत अच्छे हो गए रामकुमार और रोहन भी सामान्य स्तर के विद्यार्थियों में शामिल थे। इसी के साथ निज़ाम की मित्रता उस क्लास में प्रथम, द्वितीय आने वाले छात्र से हो गई और वो दोनों बेस्ट फ्रेंड हो गए।

वह मित्रता अंत तक चलती रही और वहांँ पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल का कहा गया कथन की एक अच्छा मित्र वैद्य की तरह होता है सही साबित हुआ।उसकी अच्छी संगति, शांभवी मैम के ममत्व, विश्वास और स्नेह का परिणाम था कि जो निज़ाम पिछली कक्षा में 10, 11, 12 नंबर पाता था वह इस वर्ष 83 प्रतिशत से वार्षिक परीक्षा को पास किया।

जब उसे परीक्षा फल मिला तो वह दौड़ते हुए शांभवी मैम के पास आया और अपना परीक्षा फल दिखाया।उसके परीक्षा फल को देखकर शांभवी मैम फूले नहीं समा रही थीं। और ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित कर रही थीं कि हे ईश्वर! तूने मुझे यह शुभ कार्य करने का अवसर तथा विवेक प्रदान किया इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद!

इस तरह शांभवी मैम के सही दिशा निर्देश, धैर्य, परिश्रम, विश्वास ने एक बच्चे की ज़िंदगी को बदल दिया। सच ही कहा जाता है कई बार सही दिशा निर्देश न मिल पाने के कारण तथा भावेश में लिए गए निर्णय के कारण बच्चे गलत राह पर चले जाते हैं। वो अपनी तथा अपने परिवार की छवि धूमिल करते हैं और अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर बैठते हैं।

अतः मैं यहांँ यही कहना चाहूंँगी कि किसी के भी बारे में धारणा बनाने से पूर्व कई बार सोचिए। क्योंकि कई बार कानों सुनी और आंँखों देखी बात भी ग़लत होती है। तथा हमारे द्वारा लिया गया एक सही फैसला अगर किसी की ज़िंदगी को महका सकता है तो एक ग़लत फैसला उसे बर्बाद भी कर सकता है।

सीख- हम किसी के भी बारे में बहुत जल्दी में कोई धारणा बनाकर निष्कर्ष पर न पहुंँचे। क्योंकि, जल्दीबाजी में लिया गया निर्णय किसी की ज़िंदगी को तबाह कर सकता है।

साधना शाही, वाराणसी

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By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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