जगन्ननियंता के इस जग में,
कोई नहीं सौंदर्य विहीन।
सुंदर दृष्टि ही देख सके इसे,
देख ना सकता कोई हीन।

वैदिक काल में सुंदरता का,
अर्थ बना था अध्यात्मिकता।
वेदों में सौंदर्य शब्द को,
आनंद, मोह से जाना जाता।

अंतर्मन की सुंदरता को,
सबने है स्वीकार किया।
सच्चे मन का, चरित्र भी सच्चा,
यह सबने ही मान लिया।

कुछ अर्वाचीनों ने समझा,
वाह्य सुंदरता ही है महान।
उन मूढ़ों को कौन बताए,
तुमको नहीं है कुछ भी ज्ञान।

बाह्य सुंदरता है इक छलावा,
किसी को वो छल लेती है।
उस सुंदरता पर मरने -मिटने वालों को,
बाद में कुछ ना देती है।

इस जीवन का कोई मोल नहीं है,
यह सागर का पानी है।
बिन श्रृंगार जो मन को मोहे,
वही सुंदरता की निशानी है।

पाक हृदय ही सुंदर होता,
जो कल्याणमयी भी हो।
सुंदरता ना पुरानी होती,
जब देखो वैसी ही हो।

आंखों को जो भाए सुंदरता,
उसका जीवन छोटा है।
मन की सुंदरता अजर- अमर है ,
वो नश्वर ना होता है।

सुंदर तन से प्राण निकल गए,
फिर वह क्यों ना सुंदर है?
खाल उतारो एक रक्त मज्जा,
अंदर कोई ना अंतर है।

सुंदर काया का मोल नहीं है,
यह तो मोह व माया है।
मानव कर्म यदि सुंदर हैं,
जग नतमस्तक हो आया है।

संस्कार, व्यवहार ,विचार हो सुंदर,
वह सुंदर कहलाता है।
इससे हीन सुंदर हो कलेवर,
वह अभिशाप बन जाता है।

साधना शाही, वाराणसी

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By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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