मन को तो बेटा लगाना पड़ता है
कभी-कभी मम्मी पापा को भी भुलाना पड़ता है
अभी तो यह शुरुआत है
एक दिन इस घर से विदा होकर
मांँ-बाप को रुलाना पड़ता है
जिनके बिना एक पल रहना गवारा नहीं था
उन्हें ही भूलाना पड़ता है
समाज के बनाए नियमों को निभाना पड़ता है।

कल तक जो घर तुम्हारा था
जहाँ तुम्हारे कह- कहे गूंँजे थे
जहाँ तुमने की थी नादानियाँ
जहांँ तुम रूठी थी, मम्मी ने मनाया था
जहाँ तुम जिस चीज की ज़िद्द की थी
पापा ने दिलवाया था
उसी घर को मम्मी-पापा का घर कहना पड़ता है
इन दुनिया के दस्तूरों के संग रहना पड़ता है।

आज ही वह शुभ दिन था
जिस दिन तुम घर- आँगन में आई थी
तुम्हें देखकर मम्मी प्रसव पीड़ा को तुरंत भुलाई थीं
तुम्हारी एक किलकारी पर रातों की नींद गवाई थीं
तुम्हारे सुखद भविष्य के सपने देख
वो हरदम मुस्काई थीं
उनको खुश रखने की खा़तिर
खुद खुश रहना पड़ता है
जन्मदिवस तेर शुभ हो बच्चा
अंतर्मन यह कहता है।
तेरे हर सपने पूरे हों
हर अपना तुझे कहता है।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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