जिस दिन मेरे गर्भ में आया,
छुप -छुप खुशी का अवसर था।
क्या बोलूं राज रखूं,
इस प्रश्न का ना कोई उत्तर था।

माह नव बीता जैसे- तैसे ,
घर में आया मेहमान नया ।
मेरी खुशियों की सीमा ना थी,
पर कुछ ने था विषपान किया।

मेरा संतान नहीं था तू ,
तू था मेरा समूचा जहान।
तुझे जी भर जब प्रात देख लूं,
मिट जाते सारे व्यवधान।

तेरे लिए सपने जब देखूं,
तो किसी से ना वह कह पाऊं।
ताड़ना कभी बढ़ जाए इतनी,
चाह कर भी ना सह पाऊं।

मन तो ममता का सागर था,
मन में था भरा अरमान बड़ा।
जीवन भी ना अब अपना था,
इस पर भी था अधिकार तेरा।

तुझ में बसते थे प्राण मेरे,
बस तुझे देखकर जीती थी।
मीरा ने पिया था गरल एक दिन ,
मैं हर रोज ही पीती थी।

वक्त था अपनी चाल चला,
वह ना करता है कभी इंतज़ार,
नन्हा शिशु जो मेरी उर्जा था,
अब वो रहने लगा बीमार।

वह हंसना, चलना सीख लिया,
मेरी उंगली को पकड़ -पकड़।
उसकी मिज़मातत को ना समझें,
उसके अपने लगते थे जड़।

दिन- रात थी तत्पर सेवा में,
क्या कर दूं वो खुश हो जाएं।
पर हर सेवा का मोल नहीं,
कुछ ना कुछ त्रुटि है हो जाए।

मेरी हर युक्ति बेकार पड़े,
ताने-बाने मायूस करें।
जीवन जब बोझ सा लगने लगा,
तेरे कहकहे उसमें जान भरे।

फिर इक दिन डेहरी लांघ गई,
शायद दूरी ही कुछ कर दे।
पर दूरी भी कुछ कर ना सकी,
सपने ना देखूं चक्षु मूंद चली।

अब आंखें सपनों से भरी हुई,
सब तुझ पर ही हैं आके टिकी।
वो सपने यदि सच हो जाएं,
तो जीवन का मूल्य में समझ सकी।

साधना शाही, वाराणसी

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By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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