मैंने किसी के मुंह से सुना था थूक चाटने से कभी प्यास नहीं बुझती
पर समय ने बताया
बुझती है साहब बुझती है
थूक चाटने से भी प्यास बुझती है।

याद करिए
जब हम ग्रीष्म ऋतु में यात्रा कर रहे होते हैं
हमें प्यास लगती है
हमारे पास पानी नहीं होता है
और जगह भी ऐसी
जहां पानी मिल भी नहीं सकता
हमारा गला सूख रहा होता है
उस समय वह थूक
वह लारवा ही हमें जीवन दान देता है
अगर हमारे मुंह में वह थूक
वह लारवा नहीं होता
तो हमारे प्राण पखेरू शायद उड़ जाते
फिर हम कैसे कह सकते हैं
कि थूक चाटने से प्यास नहीं बुझती
यह उपेक्षित थूक और
लारवा ही तो हमारे प्राणों की रक्षा किया।

याद करिए उस गरीब को
जिसके लिए एक रोटी
छप्पन भोग की भांति प्रिय होती है
क्योंकि जब एक रोटी उसका बच्चा खाता है
तब वही रोटी उसके बच्चे प्राणों की रक्षा करती है
जिस एक रोटी का अमीरों को कोई महत्व नहीं होता
उसे वे डस्टबिन में डाल देते हैं
वही एक रोटी एक गरीब के बच्चे की क्षुधा पूर्ति कर
उसके प्राणों की रक्षा करता है
फिर हम
कैसे कह सकते हैं कि
एक रोटी की क्या कीमत है।

याद करिए उस 6 इन्च के मास्क को
जब कोरोना ने अपना पांव पसारा
जब दुनिया में त्राहि-त्राहि मच गई
जब महंगे कपड़े शोरूम में टंगे रह गए
किसी पर धूल की परत जम गई
तो कोई चूहे की उदर पूर्ति का साधन बन गया
और वह 6 इंच का टुकड़ा मास्क
करोड़ों की जिंदगी बचाने का जरिया बन गया
और आज भी बना हुआ है
फिर कैसे हम
उस छः इंच के कपड़े को
उपेक्षित कर सकते हैं।

याद करिए उस जहां-तहां उगने वाली तुलसी और गिलोय के पौधे को
जब कोरोना ने अपना रौद्र रूप दिखाया
तब महंगा खोया, पनीर, मिठाईयां किचन से गायब हो गईं
और तब हर घर के किचन में गिलोय और तुलसी अपना घर बनाए
तब प्रत्येक घर से
सुबह -शाम
एक ही आवाज आती थी
और वह आवाज होती थी
तुलसी और गिलोय के कूटने की
एक ही खुशबू होती थी
और वह खुशबू होती थी
तुलसी और गिलोय के काढ़े की
कुछ घरों में यह आवाज और खुशबू आज भी बरकरार है
यह सस्ती सी जड़ी- बूटी कोरोना के दौर में अमृत बन गई
और महंगी दवाइयां
या तो धरी की धरी रह गईं
या फिर
लोगों के लिए एक छलावा साबित हुईं
फिर कैसे हम उस सस्ती जड़ी-बूटी को उपेक्षित कर सकते हैं
जो हमारे लिए जीवनदायिनी साबित हुई।

इतना सब कुछ कहने का अभिप्राय
सिर्फ इतना ही है साहब
कि
कभी किसी को,
कम मत आंको
हवा और पानी बहुत सरल होते हैं
परंतु बड़े-बड़े प्रस्तर खंड को उखाड़ फेंकते हैं
दवाइयों की टिकिया
बहुत छोटी सी होती है
पर
बड़े-बड़े रोगों पर विजय प्राप्त करती है
एक मजदूर की औकात
अट्टालिकाओं में रहने वाले लोगों के आगे कुछ भी नहीं होती
किंतु
वही मज़दूर यदि कार्य करना बंद कर दे तो
अट्टालिकाओं को
धराशाई होते देर नहीं लगेगी
एक विद्यालय और कार्यालय में
कार्यरत चतुर्थ श्रेणी के कार्यकर्ता की औकात
वहां कार्यरत अधिकारी के आगे
कुछ भी नहीं होती
किंतु
वही चतुर्थ श्रेणी कार्यकर्ता
यदि एक दिन नहीं आता है
तो
कार्यालय और विद्यालय अस्त व्यस्त हो जाते हैं ।
अतः ध्यातव्य है-

कभी किसी को कम मत आंको ,
उसकी ताकत को तुम झांको।
धड़कन होती है छोटी सी,
जिस बिन शरीर का मोल नहीं है।

प्रत्येक अहंकारी को समर्पित

साधना शाही, वाराणसी

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By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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