आज आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि है ।आज पूरे देश में बिजोया, आयुध पूजा, दशहरा या विजयदशमी का त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा ।जगह-जगह पर रावण ,मेघनाद ,कुंभकरण के पुतले जलाए जाएंगे ।किंतु क्या दो,चार पुतले जला लेना ही विजयदशमी की सार्थकता है, शायद नहीं विजयादशमी की सार्थकता तभी है जब हम अपने अंतर्मन के रावण को जलाएं। अतः अगर वास्तव में हम विजयादशमी मनाना चाहते हैं तो उसके लिए आवश्यक है हमारे अपने अंदर के रावण को जलाना, हमारे अंदर जो विकार हैं ,जो वृतियां हैं उन्हें नष्ट करना ।और उनके स्थान पर सद्विचार सत्कर्म को स्थापित करना। यदि हम ऐसा करने में सफल हो जाते हैं तब तो दशहरे की सार्थकता है अन्यथा एक थोथा प्रदर्शन के अलावा कुछ भी नहीं है। विजयदशमी की सार्थकता को मनाने हेतु हमें किन चीजों का परित्याग करना है और कन्हें अपनाना है इन बातों को जानने के लिए आईए पढ़ते हैं हम आज की अपनी नई कविता-

दुर्विचार को बस तुम त्यागो

हिंदुओं का प्रमुख त्योहार दशहरा,
छुपा है इसमें राज बड़ा गहरा।

मास क्वार है, शुक्ल है पक्ष,
दशमी तिथि को होता बंदोबस्त।

राम ने रावण को था मारा,
दुर्गा ने महिषासुर संहारा।

नवरात्रि दस दिन मां ने युद्ध किया था,
मानो धरती को प्रबुद्ध किया था।

सत्य की विजय, असत्य गया हार,
छंट गए सारे कुत्सित विचार।

विजयादशमी, विजोया, आयुष पूजा अन्य नाम है ,
सत्कर्म विजय ही इसका काम है।

वीर शस्त्र की पूजा करते,
नव कार्य आरंभ हैं होते।

कार्य आरंभ जो इस दिन होता,
ना उसमें कभी क्षय है होता।

बड़ी पुरानी बात को जानो,
रणभूमि में महता मानो।

विजय प्रार्थना इस दिन करके,
रणभूमि में नृप प्रस्थान थे करते।

इस दिन रावण नहीं जलाओ,
अंतर्मन के विकार मिटाओ।

तामसिक विचारों को तज दो तुम,
अपने मन पर विजय करो तुम।

स्व शक्ति को तुम पहचानो,
स्वविकार को दानव मानो।

दानव सा ही करो संहार ,
तुम संग हर्षित हो संसार।

सद्विचार के शस्त्र को पूजो,
परमानंद शिखर को छू दो।

शस्त्र पूजन की यह तिथि है,
उपक्रोश तजने की विधि है।

भारत की पहचान है वीरता,
संयम ,सत्कर्म, प्रत्युत्पन्नमतित्व और धीरता।

यह गुण हमसे दूर न जाएं,
इसीलिए दशहरा हम बनाएं।

दस पापों का नाश जो कर ले,
वो नर दशहरा पर्व को वर ले।

काम,क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर,
अंतर्मन में ना ये करे घर।

आलस्य, हिंसा,चोरीऔर
अहंकार,
जो अपनाए उसकी तय हार।

दूर्विचार को झटपट त्यागो,
सद्विचार को ले पट भागो।

मंत्र यदि तुम लिए यह जान,
तभी दशहरा का है मान।

साधना शाही, वाराणसी

श्रद्धेय पाठकों,
मेरे लेखन में उत्तरोत्तर उन्नति हेतु आपके सुझाव व टिप्पणियां सदा शिरोधार्य हैं। मैं आभारी हूं उन सभी पाठकों का जिन्होंने अपने सकारात्मक टिप्पणियों से मेरा उत्साहवर्धन किया।🙏🙏🙏🙏🙏

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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