नटखट

वे नटखट चुलबुले और लापरवाह कदम
जिनसे हमारी दुनिया रोशन होती थी
जिनसे घर का हर कोना
जगमग होता था
जिनका लड़ना -झगड़ना, रूठना -मनाना,
आरोप लगाना दिन-रात लगा रहता था
जिनका मासूम सा चेहरा
इस दिल की तमस को
आभायुक्त कर देता था
जिनकी वजह से
यह बेजान सा कमरा घर बनता था
आज वो पक्षी बड़े हो गए
छोड़ इस नन्हे से घोसले को
छोड़ इस घोसले के चिड़ा चिड़ी को
निकल गए अपना वजूद बनाने
निकल गए आसमां की गहराई नापने
निकल गए अपने और हमारे सपने को सच बनाने
अपने अथक परिश्रम से अपना और हम सभी का जीवन सजाने।

वो टहनी जिसे वो जन्म से जानते थे
वो टहनी जिसे वो दूर से ही पहचानते थे
आज उस चिर -परिचित टहनी को छोड़ कर चल दिए
आज वोकूद पड़े इस भवसागर में
हर झंझावातों के हल के लिए
अब वो खुद से खुद के लिए एक नई टहनी तलाशेंगे
यदि वो टहनी सुखदाई नहीं हुई
तो उसे फिर वो तराशेंगे
फिर उस टहनी को वृक्ष
और वृक्षों से उपवन बनाएंगे
और उस उपवन को फूलों से महकाएंगे।

फिर एक दिन ऐसा होगा
कि उसमें चिड़ा ,-चिड़ी भी साथ होंगे
संग सबके खुशियां और जज्बात होंगे
फिर घर का हर कोना रोशन होगा
फिर उस घर में हर रोज जश्न होगा
और फिर इस दिल में उठने वाली हिलोरें
शांत ,शांत और बिल्कुल शांत हो जाएंगी
क्योंकि
अब जीवन से दूर हर क्लांत हो जाएंगी
इस जीवन की हर आरजू पूर्ण हो जाएगी
हमारे ज़िंदगी की परिभाषा संपूर्ण हो जाएगी
और फिर
कभी इस लोक से तो कभी दूसरे लोक से
ये आंखें अपने बच्चों को स्नेहिल नजरों से देख प्रसन्न होंगी
क्योंकि अब
जीवन की हरपरेशानियों का दमन होंगा
और यूं जीवन हमारा पूर्ण होगा
तथा जीवन का हर अध्याय संपूर्ण होगा।

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By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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