कल जिसे घर कहते थे,
आज वह मकान बन गया।
कल का क्रिया प्रतिक्रिया करता हुआ शरीर ,
आज सब कुछ करते हुए भी बेजान बन गया ।

कल घर में रौनकें थीं और उल्लास था ,
आज सब कुछ खत्म सूना जहान बन गया।
कल जो दिन -रात घर में उधम मचाते थे,
आज वो ही मेहमान बन गया।

जीवन जीने के लिए चलना पड़ता है,
किंतु ,चलना हुआ मुश्किल शरीर जाम पड़ गया।
क्या करें ,क्या ना करें ,के उहापोह में उलझी थी,
आज समाप्त हुई उलझन और एक प्रावधान बन गया।

दिल में हसरतें और आंखों में अनगिनत सपने,
इसके बाद भी क्यों जीवन सुनसान पड़ गया?
अनजाना सा डर साए की भांति साथ- साथ चलता है,
इश दूर करें इस डर को वरना यह जीवन का एक व्यवधान बन गया।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *