मन और मौसम

दिन तो रोज होता है,
पर एक सा नहीं रहता।

कभी यह मन को भाता है,
कभी उदास है रहता।

कभी लगता है अरमानों को,
मानो पंख मिल गए हैं।

तभी लगता है मानो,
सपनों के स्तंभ हिल गए हैं

कभी जूही की खशबू,
परिवेश को उनमत्त है करती।

मन यूं प्रफुल्लित है ,
ज्यूं कार्तिक में धूप है लगती।

कभी ऐसा भी लगता है ,
बबूल की खेती फैली है।

जहां उपजता था सोना,
वहां की दुनिया मैली है।

मैं सपनों में खोई थी,
जाने क्या सोच के रोई थी।

अतीत स्याह सा दिखता था,
प्रफुल्लित मेरी भावी थी।

काले बादल यूं थे गायब,
ज्यूं जेठ दुपहरी ठिठुरन।

चित्त इतना हर्षित लगता,
मानो गायब है सारी उलझन।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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