मूर्ख दिवस

आज फर्स्ट अप्रैल अर्थात् मूर्ख दिवस का सुमार पूरे विश्व में छाया हुआ है। आज प्रत्येक स्त्री- पुरुष ,वृद्ध -बच्चे अपने भाई-बहन ,मित्र, संबंधी, शिक्षक को मूर्ख बनाने की नई-नई युक्तियां तलाशते हैं। जबकि उनमें से अधिकांश लोग इस दिवस की सच्चाई से अनभिज्ञ हैं, उन्हें नहीं पता कि यह मूर्ख दिवस 1 अप्रैल को ही क्यों मनाया जाता है। बस भेड़ चाल की तरह देखा- देखी मूर्ख दिवस मनाने में लगे हुए हैं।

तो आज की मेरी कविता इन्हीं मूर्ख दिवस के चहेतों को समर्पित है।

दिवस कहां से नया यह आया,
इसका नहीं कोई साक्ष है।
पूरी दुनिया में है मनता,
वजह नहीं कोई खास है।

कब से कहां से दिन यहआया,
नहीं प्रमाणित इतिहास है।
1381 सन से,
इसकी हुई शुरुआत है।

अंग्रेजी साहित्य के पिता,
ज्योफ्री चौसर एक ग्रंथ लिखे,
1 अप्रैल और मूर्खता के मध्य,
जहां कई संबंध दिखे।

मूर्ख बनाने की प्रेरणा,
रोमन त्योहार हिलेरिया लाइ।
भारतीय त्योहार होली कर ली अनुसरण,
मध्यकाल में ‘फर्स्ट ऑफ फूल’ ले आई।

इंग्लैंड राजा रिचर्ड द्वितीय,
रानी बोहेमियां की सगाई की बात हुई।
32 मार्च को शुभ दिन निकला,
जश्न भी खासम खास हुई।

कुछ दिन बाद एहसास हुआ यह ,
32 दिन का ना कोई माह।
यहीं से मूर्ख दिवस है पनपा,
ठूठी डाली ना कोई छांव।

पूरे विश्व में फैल गया है
ले बैसाखी टूटे पांव।
मूर्ख दिवस चहूं और है छाया,
शहर, गली ,कस्बा और गांव।

राजा बोक्सर था यूनान का,
जिसे सपने में चींटी निगली।
राजा -रानी हंस लोट-पोट थे,
ज्योतिष ने हंसी की तारीख मुकर्रर की।

हिंदू नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा,
अंग्रेज थोपे जनवरी एक।
उनकी बात जब हम ठुकराए,
मूर्ख उपाधि किए वो भेंट

उनकी भेंट सहर्ष स्वीकार कर,
आज भी कुछ लोग मूर्ख बने।
अपने संस्कारों को भूले,
दूजे का है वितान तने।

फर्स्ट अप्रैल नहीं वर्ष भर,
आज हर पल मूर्ख हम बनते हैं।
लॉटरी, हनी ट्रैप, ई-मेल के जरिए,
नित दिन धूर्तों से ठगते हैं।

साधना शाही वाराणसी

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By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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