मेरे मन के भाव
आज बेटी दिवस की पूर्व संध्या पर मेरे मन के भाव-

बेटी सुबह की ठंडी हवा है
प्रात की रश्मि दिल का सुकून
प्रात- रात है इससे होता
हर माता-पिता की जुनून।

जेठ की दुपहरी में देवदारू सा शीतल
पूष के आधी रात में है सूर्य की तपन
पावस ऋतु में सावन की रिमझिम
बेटी से जग उज्जवल
और और बेटी से ही मद्धिम।

सृष्टि का अस्तित्व इसी से
घर को घर ये ही हैं बनाती
इन बिन घर है भूत का डेरा
हर चेहरे पर खुशहाली लातीं
बेटी से ही घर की रौनक
बिन बेटी श्रीहीन।

बेटी दुर्गा, बेटी लक्ष्मी ,बेटी ही है मां शारदा
बेटी ही है घर की इज्ज़त
बेटी से ही है मर्यादा।

मधुमास की ये है कोकिल
ये वीड़ा की तान
अजर – अमर बेटी है मित्रों
ये ना है मेहमान।

बेटी है फूलों की खुशबू
बेटी ही है पराग
बेटी की महत्ता को जानो
बेटी दिवस पर आज।

यह सब को है ऊर्जा देती
फैलाती है प्रकाश
बेटी है सब की आकांक्षा
है यह सब की आस

पिता की है यह छोटी मम्मी
मम्मी का है सपना
इस सा सगा न कोई जग में
ना कोई इससे अपना।

यह है घर को संतुलित करती
हर जन को है प्रफुल्लित करती
सबके हित हे जीवन इसका
खुद का ना यह चिंतन करती।

साधना शाही, वाराणसी

मेरे प्रिय पाठकों!,
उम्मीद करती हूं आपको मेरी रचना पसंद आएगी ,मेरी रचना को और भी परिमार्जित करने के लिए आपके सुझाव सहर्ष स्वीकार हैं।🙏🙏

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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