मेरे संग में केसर क्यारी है,
संग सर को मिलाना गवारा नहीं।

मुट्ठी भर शुभचिंतक अच्छे,
बस नाम का अपना प्यारा नहीं।

जो संग में हैं जां सदृश है,
छलियों को शामिल क्यों करना।

वो रब से मुझको लगते हैं,
खुदगर्जो से है क्यों मिलना।

पुष्प जीवन में मधु ले आते,
शूलों से पीड़ा मिलती है।

जूही पुष्प से भरा मेरा उपवन,
इससे प्रकृति रूप- रंग बदलती है।

मेरे जीवन में ना धुंध है अब,
जो कुछ वर्षों तक छाया था।

वो मिट गया मेरे जीवन से,
जिसने मुझे बड़ा डराया था।

यह सब करना आसान न था,
पर मन बिल्कुल परेशान न था।

स्व -विश्वास और प्रभु का आस,
भी संग रहते यह ध्यान न था।

केसर क्यारी की खुशबू अब,
जीवन को सफल बना देगी।

मैं खुश हूं अपने फूलों संग,
नागफनी कलह फैला देगी।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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