वक्त यूं गुजर गया,
मानो कल की बात है।
कल घर में कहकहे थे,
आज कोई न साथ है।

कल थोड़ा चुप भी रह लो
कहती थी,
आज चुप्पी ही काटती है।
घर की दीवारें मानो,
बस राह ताकती हैं।

कब आएंगी बहारें,
विराने से गुलशन में।
प्रफुल्लता के आसरे,
सुनसान काटते हैं।

कल के अजनबी विराने,
आज पहचान हैं बढ़ाते।
जितना घटाना चाहो,
उतना ही बढ़ते जाते

नीरव गलियां चौराहे,
मां की ममतामई बाहें।
तेरे कल को याद हैं करती,
जाती जहां-जहां निगाहें

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *