संबंधों का अंत जो चाहो ,
झूठ का ले लो सहारा।
एक दिन जीवन में आएगा,
ना होगा कोई प्यारा।

पैर पसारेगा यह शुरू में,
विकास बड़ा ही करेगा।
एक दिन ऐसा आएगा,
हर अपनों को देख डरेगा।
फिर ना इसका कोई अपना होगा,
ना होगा विश्वासी ।
यह जग सारा सूना लगेगा,
जाओ बन जाओ सन्यासी।
सन्यासी बन करके भी,
कहीं चैन मिले ना तुम को।
तन- मन दोनों ही भटकेगा,
ना होगा कोई किनारा ।

संबंधों का अंत जो चाहो ,
झूठ का ले लो सहारा।
एक दिन जीवन में आएगा,
ना होगा कोई प्यारा।

हर संबंध का अंत करेगा,
जीवन वीरान करेगा।
अपमानित होकर जिओगे,
ना कोई सम्मान करेगा।
सच धीरे- धीरे चलता है,
पर मंजिल पर जाता।
मंजिल ज्यूं इसको है मिलती,
झूठ बड़ा पछताता।
पछतावे का पर अब मानव,
कोई मूल्य नहीं है।
विश्वास सभी का उठ गया तुमसे,
जीवन मौत के तुल्य सही है।
अवसादित तेरा जीवन हो गया,
स्वास्थ्य साथ तज दिया तुम्हारा।

संबंधों का अंत जो चाहो,
झूठ का ले लो सहारा ।

एक दिन जीवन में आएगा,
ना होगा कोई प्यारा।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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