समय और छात्र

किसी का चेहरा खिला-खिला है,
कोई बड़ा उदास है।
कुछ के पास सभी का उत्तर,
एक न किसी के पास है।

पहले समय जो खेला कूदा,
आज मुॅंह लटका कर बैठा है।
समय को जिसने जाना समझा,
प्रतिभा उसके भीतर पैठा है।

शिक्षक कक्षा में जब आते,
बड़े बहाने करते थे ।
अच्छी बातें बड़ा सताती,
बुरे से ना वो डरते थे ।

वो ही आज डरे सहमें हैं,
इधर-उधर बड़ा तकते हैं।
ताकि- झांक चाहे जितना कर लें,
उत्तीर्ण न वो हो सकते हैं।

समय को पूर्व में तुमने गॅंवाया,
आज तुम्हें वो गॅंवाता है।
रेत सा खिसक गया मुट्ठी से ,
फिर वापस ना आता है।

इसीलिए तो कहती बच्चों,
वक्त की कीमत को समझो।
क्या? कहां? कब ?और कैसे?
इन बातों में तुम मत उलझो।

छात्र का सर्वोच्च गुण है होता,
वक्त की कीमत को जानो।
जग में जो हैं नाम कमाए,
मार्गों को उनके पहचानो।

चेष्टा कर लो काग के जैसा,
बगुले सा तुम ध्यान लगाओ।
अनर्गल बातों से दूर रहो तो,
सब कुछ जीवन में कर पाओ।

स्वान सी हल्की निद्रा लेना,
प्रथम प्रहर में जागो तुम।
कलाम ,पी टी उषा ,सचिन बनोगे ,
बदनामी हो जाए गुम।

रवि, शशि सा तुम्हें विश्व फलक पर,
बच्चों यदि निश्चित जाना है ।
हर पल की कीमत पहचानो,
इसको नहीं गॅंवाना है।

खो दिए यदि इसे खेलकूद में,
सिर धूनोगे पछताओगे ,
चाहे लाख यत्न तुम कर लो,
वापस ना ला पाओगे।

साधना शाही ,वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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