आज हर तरफ रिश्ते सिसक रहे हैं,
नहीं जी प्यार संग चहक रहे है

इन्हें जोड़ने की डोर इतनी कमजोर पड़ गई है,
कि
गर्दिशों में भी ये बहक रहे हैं।

आज सिर्फ कहने को लोग अपने हैं,
लेकिन अपने ही अपनेपन का एहसास खो चुके हैं,
आज बेगानों की शोहरत का कुछ लोग जश्न मना लेंगे ,
किंतु
अपनों के शोहरत से निराश हो चुके हैं।

हमारे अंदर का अहम ही तो है
जो हमें अपनों से जुड़ने नहीं देता
रिश्ते में बड़े होने पर भी हमें उनके आगे झुकने नहीं देता
जिनकी तिजोरी में हरे -हरे नोटों की गड्डियां बहुत कम हैं
दर्द से कराह भी रहे हों
तो वहां कभी रुकने नहीं देता।

ऊंची कोठी में रहने वाले दिखावटी रिश्ते की
एक छोटी सी छींक पर तो
उनकी जान भी हाज़िर है
किंतु सामान्य से घर पर रहने वाले
भाई -भतीजे के लिए वे सदा गैर हाज़िर हैं।

हमें बर्बाद करने को
किसी गैरों को नहीं है फुर्सत
इसके लिए तो
हमारे अपने ही इंतजार किए बैठे हैं
हम तो
आकाश की गहराईयां नापने के
सपने देख रहे थे
और वो
चढ़ाइयां चढ़ते ही घाव पर
घाव दिए बैठे हैं।

इस सौतेलेपन से मैंअश्क के समंदर में डूबते जा रही थी
किंतु आज
पता नहीं क्या हुआ
समंदर ने ही मुझे किनारे पर ला खड़ा कर दिया
और मैं उसके इस एहसान पर झुकते ही जा रही थी।

वही अपने जो कल कनखियों से देख कतरा जाते थे
आज कलयुगी प्यार , सौहार्द्र व खुशियों से भर जाते हैं
बधाइयां जुबान से ही नहीं देते
घर के हर कोने में धर जाते हैं।

पर मैं उस दिन को नहीं भुला पा रही थी
जब यही अपने थे जिन्हें मेरी कराह सुनाई नहीं दे रही थी
क्योंकि हमारे शरीर के कपड़े पुराने थे
और हमारी तिजोरी
लाखों की गवाही नहीं दे रही थी
मैं भी उन दिखावटी अपनों के साथ
दिखावटी मुस्कान मुस्कुरा रही थी
भगवान को धन्यवाद ज्ञापित कर ।
अपने आप पर इतरा रही थी।

साधना शाही, वाराणसी

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By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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