सूर्य और मानव

बनो तुम सूरज के जैसा,
सभी को एक तुम समझो।
यह मेरा-तेरा के,
चिंतन में नहीं उलझो।

दीन- धनी दोनों को ही,
रवि उर्जा एक सा देता।
किसी को तुच्छ ना समझे,
सभी उसे उच्च है लगता।

संसाधन के धनी तुम हो,
सदा सुकर्म करना तुम।
पाटो ऊंच-नीच की खाई ,
असमानता को कर देना गुम।

सूर्य उदित जब होता है,
चहुॅं खुशियां छा जाती हैं।
जातक ,दाता सभी संग में,
पूरी दुनिया हर्षाती है।

अपने संसाधन को भी ,
सभी के बीच बाॅंटो तुम।
सभी को मीत तुम समझो,
ना अरि समझ कर डाॅंटो तुम।

निशा जब तामसी लगती,
दिवस उसे दूर कर पाया।
खिली ज्यू अंशु की रश्मियाॅं,
सात्विक जग था जगमगाया।

निशाचर से मानव हैं जो,
रात्रि में अमानुष कृत्य है करते।
संसाधन संधान करो ऐसा,
नापाक नृत्य ना करते।

अर्घ दे प्रातः दिनकर को ,
सुख -समृद्धि हम पाते।
व्याधियाॅं झटपट भागती हैं,
दुख- संताप हैं तजते।

मानव- मानव से यदि,
मानवता दिखलाता जाए।
अखंड भारत का सपना तब,
शीघ्र संपूर्णता को पाए।

रवि, मनु एक से यदि हों,
जीव मात्र सभी प्रफुल्लित हों।
रुदन ना कहीं सुनाई दे,
धरावासी सब हर्षित हों।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *