एक नन्ही सी बालिका जिसे उसके चचेरे चाचा पर बड़ा ही विश्वास था। उसे लगता था उसका वह चाचा बड़ा ही नेक दिल इंसान है। दोनों के मध्य रिश्ते प्रगाढ़ता की चरम सीमा पर थे। किंतु उसकी चाची उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं करती ।वो उसे सदा ताना मारने का एक भी अवसर खोने नहीं देती।

वो बात – बात में कहती तुम तो अपने हर छोटी बड़ी ज़रूरत के लिए किसी न किसी के सामने हाथ फैलाए रहती हो। यदि तुम्हारे पिता तुम्हें पढ़ाने में सक्षम नहीं है, तो क्यों पढ़ने के पीछे पागल हो ?

छोड़ दो पढ़ाई- लिखाई, घर का कामकाज करो ।उसके चाची की ये बातें उसे तीर सी लगतीं। और उसके फौलादी इरादे को पिघलाकर कुछ पल के लिए मोम बना देतीं। लेकिन मरता क्या न करता ।उसके पास और कोई चारा नहीं था ।अतः अपमान का घूॅंट पीकर अपने हिम्मत को सॅंजोकर अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ते हुए अपने सपनों को पूरा करने में लग जाती ।समय बीतता रहा बालिका छोटी से बड़ी हुई।

पढ़ाई- लिखाई में अव्वल दर्जे की थी किंतु बदकिस्मती! उसके पिता उसके पढ़ाई का खर्च उठाने में सक्षम नहीं थे।वो एक मामूली से किसान थे। बालिका ट्यूशन पढ़ाकर, कुछ छोटा – मोटा काम करके अपने पढ़ाई का खर्च उठा रही थी। किंतु नियति का खेल तो देखिए भगवान को उस नन्हीं सी बालिका के इतने संघर्ष से संतोष नहीं हुआ। एक दिन ट्यूशन पढ़ाकर जल्दी – जल्दी घर आ रही थी, समय बीता जा रहा था ,अंधेरा आने को आतुर हो रहा था।

तभी एक आंधी के वेग में चलती हुए कार आकर उसे टक्कर मारी और और बालिका धड़ाम से जाकर के कुछ दूरी पर गिरी और गिरते ही जैसे उसकी दुनिया में अंधेरा छा गया। क्योंकि, वह अपने एक पैर को हिलाने – डुलाने में सक्षम नहीं थी। अपने पैरों की ऐसी हालत देखकर उसके आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे ।

उसे समझ में नहीं आ रहा था अब आगे वह क्या करे ।सड़क पर भीड़ इकट्ठा हुई उस भीड़ में कुछ नेक दिल इंसान भी थे जिन्होंने उस बालिका को पास के अस्पताल में पहुॅंचा दिया। वह अस्पताल तो पहुॅंच गई लेकिन खर्च का क्या होगा? उसके पिता के पास तो फूटी कौड़ी नहीं है ।और बालिका जो मेहनत मज़दूरी करके पैसे कमाती थी वो हर माह उसके पढ़ाई में खर्च हो जाते थे उसका दिमाग काम करना बंद कर दिया था।

वह कुछ भी सोच पाने में सक्षम नहीं थी। उसे कुछ नहीं समझ आ रहा था कि वह क्या करे? कैसे अपना इलाज़ करवाए? कैसे वो फिर से अपने पैरों पर खड़ी होगी ?आगे उसकी ज़िंदगी का क्या होगा? उसे लग रहा था शायद उसकी ज़िंदगी बस यहीं पर रुक जाएगी ।कभी वह सोचती काश! इस दुर्घटना में मेरी मौत हो गई रहती तो कम से कम इस तरह बेबस लाचार इस बिस्तर पर तो न पड़ी होती।

तभी उसे अपने उस चचेरे चाचा की याद आई । उसे विश्वास था कि उसका चाचा इस मुसीबत में ज़रूर काम आएगा। इसी विश्वास के साथ उसने अपने चचेरे चाचा को फोन किया। और सारी स्थिति से अवगत कराया उसके चाचा ने उससे कहा। तुम बिल्कुल भी परेशान मत हो, किसी बात की चिंता मत करो , सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम अपने स्वास्थ्य का ध्यान दो ।मैं सब कुछ देख लूॅंगा यही तो वह दिन होता है जब अपने और पराए की पहचान होती है। इस घड़ी में जो तुम्हारे साथ न हो उसे अपना कहना अपनों को गाली देने केसमान होगा । चाचा की बात को सुनकर बालिका को ईश्वर पर विश्वास हो गया कि दुनिया अच्छे लोगों से खाली नहीं है ।यह मेरे सगे चाचा भले ही नहीं है लेकिन मेरे लिए ये सगे से भी बढ़कर काम करने को तैयार हैं।

उस बच्ची का ऑपरेशन हो गया ।ऑपरेशन सफल हो गया। वह अपने पैरों पर चलने के काबिल हो गई ।और खुशी-खुशी अस्पताल से घर आ गई ।1 महीने आराम करने के बाद वह फिर से अपने पुराने कामों में व्यस्त हो गई।

अब उसे उसके चाचा के पैसे लौटाने की चिंता दिन-रात सताने लगी। वह जी तोड़ मेहनत करती लेकिन फिर भी इतने पैसे नहीं अर्जित कर पाती कि अपने पढ़ाई- लिखाई घर के खर्चे के बाद अपने चाचा के पैसे को लौटा सके। उसे उसके चाचा के पैसे लौटाने का एक उपाय सूझा उसके पास उसकी माॅं का दिया हुआ एक जंजीर था जिसे उसने अपनी माॅं की अंतिम निशानी समझकर सॅंजोकर रखा था उसने सोचा मैं इस चेन को चाचा को उनके पैसों के बदले दे देती हूॅं।

क्योंकि मैं कितना भी परिश्रम कर लूॅं उनके पैसे लौटाने में मैं अभी सक्षम नहीं हो सकती हूॅं। जब तक कि मैं किसी बड़े मुकाम पर ना पहुॅंच जाऊं। और चाचा ने इतने पैसे हमारे ऊपर खर्च दिए यह बात यदि चाची को पता चल गया तो घर में कलह मच जाएगा । चाचा के घर को कलह से बचाने हेतु उसने अपने चाचा को चेन लेने को कहा उसके चाचा चेन को देखकर आग बबूला हो गए ,उन्होंने कहा तुम मुझे इतना तुच्छ समझती हो कि मैंने तुम्हारे इलाज में थोड़े से पैसे क्या लगा दिए उसके बदले तुम्हारे माॅं की दी गई अंतिम निशानी यह चेन ले लूॅं और अपनी ही नजरों में मैं गिर जाऊं।

अपने चाचा के इस तरह के प्यार और अपनत्व की बात को सुनकर उसके नज़र में उसके चाचा की इज़्ज़त और भी बढ़ गई ।वह मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करने लगी।हे भगवान! तुमने हमें गरीब तो बनाया किंतु हमें अपने से भी बढ़कर प्यार करने वाला चाचा दिया , जो हमारे सुख-दुख में सदा साए की भाॅंति हमारे साथ हैं। अब वह दोगुने परिश्रम सेअपने कार्य को करने लगी और अपने चाचा को पहले से भी अधिक पसंद करने लगी।

समय बीतता रहा वह बालिका पढ़ लिख कर एक सफ़ल वकील बन गई। लेकिन अपने चाचा के उपकार को कभी भी भूल नहीं पाती। तभी उसके मौसी का फोन उसके पास आया। और उन्होंने बालिका से पूछा , तुम्हारा पैर टूटा था तब चाचा ने तुम्हारा इलाज़ करवाया था जिस पैसे को तुम अभी तक दी नहीं ।

तुम्हें शर्म नहीं आती जो तुम्हारे बुरे वक्त में काम आया उसे परेशान करते हुए ?तुम जैसे लोगों के कारण ही मुसीबत के समय पर कोई उसका साथ नहीं देता । अब जब तुम अच्छे पैसे कमा रही हो तब भी उनका पैसा देने का नियत नहीं है तुम्हारा। मौसी के मुॅंह से इस बात को सुनकर बालिका स्तब्ध रह गई ।यह बात मौसी को कैसे पता चली और फिर मैं तो पैसों के बदले चाचा को चेन दे रही थी चाचा ही नहीं लिए थे।

इसी तरह की बात वह कुछ -कुछ समय के अंतराल पर कुछ और रिश्तेदारों से भी सुनी। इन बातों को सुनते और सोचते हुए उस बालिका को ऐसा लगा मानो उसका सिर फट जाएगा, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। उसके मानस पटल में सिर्फ़ एक ही बात बार -बार घूम रही थी ।क्यों? क्यों ?आखिर क्यों ? चाचा ने ऐसा किया? क्यों मेरी ग़रीबी का मज़ाक मेरे अपने बनकर उड़ाया। एक तरफ़ तो मुझसे अच्छे बनने का नाटक किए और दूसरी तरफ़ पूरे रिश्तेदारी मेरा मज़ाक बनाए ।

रिश्ते का मज़ाक, विश्वास का मज़ाक, अपनेपन का मज़ाक। क्यों चाचा ? क्यों ऐसा किया आप ने ? क्यों आपने चेहरे पर चेहरा लगाया ? क्यों अच्छा बनकर बुराई किए?अरे बुराई ही करना था तो बुरे बनकर किए रहते ,कम से कम मै सज़ग तो रहती, रिश्तो और विश्वास का कत्ल तो नहीं होता। बस बचपन से आज तक के एक-एक पल को सोचे जा रही थी और उसके आंखों से अविरल अश्रु धारा थमने का नाम नहीं ले रही थी।

शिक्षा – उधार को प्यार समझने का भूल कभी नहीं करना चाहिए। यह हमारी ज़िंदगी में तूफा़न ला देता है।

साधना शाही, वाराणसी

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By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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