जीवन की सच्चाई बयान करते दो कविताएंँ-

1-मंज़िल (कविता)

आँखोँ में है नींद नहीं,
दिल में बेचैनी छाई है।
अंतर्मन में सदा द्वंद उठा,
हर दिशा लगे कुंहआई ।

सोने की कोशिश करती हूँ,
पर नीँद बसी है कोसों दूर।
जितना ही सोना चाहूँ मैं,
व्याकुलता बढ़ती है भरपूर।

आंँखों में सपने आन बसे,
वो नींद को कहीं धकेल दिए।
कहीं शीघ्र भाग ना आ जाए,
इसलिए उसे हैं सकेल दिए।

श्रम तो जी भर मैं करती हूंँ,
क्यों रेत सा सब कुछ जाता छूट।
क्या हाथों में की लकीरों ने,
मन में मेरे डाला है फूट।

पर वो शायद मुझे ना जाने,
मैं उसको भी झुठलाऊंँगी।
बोपदेव की भांँति ही मैं,
लकीरों को फुसलाऊंँगी।

कर्म की रेख बनाकर मैं ,
भाग्य रेख को मेटूँगी।
जो धन- दौलत के दंभ में है,
मैं उनको कभी न सेटूंँगी।

व्यवधान भले ही पग में हो,
वो मार्ग रोक नहीं पाएंँगे।
थक- हारकर एक दिन वो,
स्वयं गर्त चले जाएंँगे।

फिर पुष्पित होगी मेरी आभा,
ज्यूं द्रुम पल्लव से गाभा।
विचलित हो लक्ष्य न खोऊँगी,
मैं व्यवधानों को धोऊँगी।

हिम्मत कैसे है टूट सके,
जब तक मंज़िल ना मिल जाए।
आलस, प्रमाद कभी छू न सके,
जब तक मन मेरा ना खिल जाए।

2-उस बेगैरत को ठोक दे तू

दिल तड़प- तड़प यह कहता है,
किसको भूलूंँ किसे याद करूँ।
मैं एक अनजानी राही हूंँ,
मैं किस रस्ते से बात करूँ।

मन में एक हूँक सी उठती है,
जीवन बंजर कर डाली हूँ,
निज उपवन को जो मसल दिया,
मैं ऐसी बेबस माली हूंँ।

अंतर्मन मेरा कहता है,
सब छोड़ स्व-हित बस सोच ले तू,
इस जग में कैसे छाएगी,
उस राह को ही बस ख़ोज ले तू।

आँखोँ में अश्क न आने दे,
कभी आए तो उसे रोक ले तू।
जिसने तुझको ना अपनाया,
उस बेगैरत को ठोक दे तू।

साधना शाही, वाराणसी

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By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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