आया कहीं से न्योता
झटपट हो गए तैयार
मिले वहां पर संगी-साथी
और सारा परिवार
सबका मिलना मन को भाई
तो समझ लो
मन बड़ा खुश है।

घर के काम सभी निपटा कर
आस पड़ोस में घूमे फिरे
दरवाज़े पर लगाकर कुर्सी
इधर-उधर नजरें जब घूरें
राहगीर से बातें करना
जब मन को अच्छा लगता है
तब समझ लो
मन बड़ा खुश हैं।

हाट- बाजार जब अक्सर जाएं
नए-नए परिधान ले आएं
जीभ चटोरी भी दिखलाएं
जाने में जब ना अलसाएं
बल्कि तेजी सदा दिखाएं
ना जाएं तो मुंह लटकाएं
तब समझ लो
मन बड़ा खुश है।

होटल रेस्तरां में हम जाएं
घर का खाना भूल ही जाएं
स्थानीय व्यंजन का लुत्फ उठाएं
चटकारे ले- ले कर खाएं
कोई रोके तो ना रूक पाए तो
तब समझ लो
मन बड़ा खुश है।

सावन की बूॅंदे जब बरसे
गरम पकौड़ी के बिन तरसें
गरम पकौड़ी की याद आए
खाने को जब जी ललचाए
जब ना मिले तो गुस्सा आए
तब समझ लो
मन बड़ा खुश है।

साज- श्रृंगार जब मन को भाए
फैशन देख न गुस्सा आए
सजने-सॅंवरने की इच्छा जग जाए
शौक सभी जिंदा रह जाए
तो समझ लो
मन बड़ा खुश है।

मौज- मस्ती का चल जब रहे पिक्चर
देखने को दिल मचले अधिकतर
जम जाए महफ़िल हो प्रत्युत्तर
आलोचना का ना हो कोई स्तर
तो समझ लो
मन बड़ा खुश है।

दोस्तों की महफिल हो कामिल
महफिल में सभी हों शामिल
अमीर – गरीब चाहे हों हामिल
निम्न वर्ग हो चाहे आमिल
तब समझ लो
मन बड़ा खुश है।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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