खेत ना बंजर मां की ममता,
यह करुणा की क्यारी है।
जग में रिश्ते गुथे हुए हैं,
माॅं की ममता न्यारी है।

खुशियों की यह चादर देती,
प्यार लुटाती हम पर।
शक्ति सदा यह हमको देती,
अपनी करुणा के दम पर।

तन व्यथित जब हुआ हमारा,
अमृत की धारा बनती।
साया सा संग विचरण करती,
हर व्याधि को करारा जड़ती।

एक खरोच हमें लग जाए,
उसके दिल को ठेस लग जाता।
नींद हमारी सोए जागे ,
यह कैसा है उससे नाता।

कवच सा हमको घेरे रहती,
खुद को गन्ने सा पेरे रहती।
मेवा- मिश्री हमें खिलाती,
खुद बचा- खुचा खा लेती।

महल अंटारी में हम रह लें,
माॅं के आंचल सा सुख ना देते।
ममता का आंचल जब ओढ़ें,
दुख ना पास हमारे फटकते।

हर पीड़ा वो खुद लेती है ,
सदा- सदा सुखकारी है।
माॅं का रिश्ता जग में ऐसा,
जिस पर जग बलिहारी है।

जन्नत ना कहीं और है बसता,
इसके चरणों में बसता।
प्यार के बोल बस इससे बोल लो,
सब कुछ ले लो इससे सस्ता।

बड़ा सलोना रूप है इसका,
रब इसमें हैं बसते।
तरह -तरह के प्यार लुटाती,
ज्यूॅं फूलों के गुलदस्ते।

इसकी आंखें अश्कों से भींगे,
ऐसा दिन ना आए।
वरना मेरे प्यारे बच्चों,
अनिष्ट बड़ा हो जाए।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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