1-तिस्ना और अहं

अहं के जैसे बड़ों खामी,
तिस्ना के रूप मे आई गहे।
सद्वृत्तिन सबकी नास भई,
सद्गुर नाहीं नर अंग सोहे।

लरिका,जगह,ज़मीन सबही,
सुनो ऐ लोगन! सब मेरो है।
कहते-कहते हम नाहीं थके,
मन मेरो बनो अब चेरो है।

मूरख मन काहे ना चेत रहा,
दुख पर दुख लागे है देत रहा।
लखता यह है लरिका बनिके,
चंचलता को जहुँ सेत रहा।

मानहुँ लकरी की गठरी सा,
विकार सबहीं ह्वै एक भयो।
थोरिन देर का साथ रहा,
फिर लहर सबहीं को लेई गयो।

सब जन अकुलाय के अलग भये,
कोऊ भाई- बंधु नहीं कोऊ का।
बेटा- बेटी,पतोह,दमाद नहीं,
बस मैं और वो जग दोऊ का।

2-वसंत ऋतु

वसंत तो आवन को है लागे,
पुष्पन,कलियन का राज भया।
सरसो,अलसी महमह महके,
शिशिर की किकुड़न का राज गया।

कान्हा अरू कांत के रजकण से,
चहुंँ धरती है लगै भीजै।
आवत- जावत सब गलियन में,
मधुमास की मधु को नर पीजै।

हमरी- तोहरी सब ही जन की,
भूमि मंजरी से है लदने लगी।
वृक्ष की डारिन पर श्यामा,
कूंँ- कूँ की धुन है करने लगी।

लरिका, छेहर, सुंदर, बाला,
खुलि खेल- खेल हैं मुदित भए।
तिन मुख की सुंदरता लखि के,
रति, काम भी मानो चकित भये।

सगरी धरती मन को मोहे,
यह मास बड़ा ही मनोहर है।
बरने को सबद है नाहीं जुरै,
मन मचलै जस खुशी धरोहर है।

नटवर- नागर को रास रहे,
दिन दून, रजनी चौगुन सुखद।
केकी, पिक,सब जन रटने लगे,
है साँझ- सवेरा ना कोई दुखद।

3-वसंत

पीली- पीली सरसों खेत में फूलन लागी,
नीली रंग की अलसी भी तो मुसकाई है।
कान्हा संग ग्वाल- बाल गउवा चरावन लागे,
राधा की सखिन सब पीछे-पीछे जाईहें हैं।
धरती से अंबर तक सबही सुभाष भए,
वृक्षन की डारि- डारि कोपल लदाई है।
नटवर संग वसंत बड़ा मन भावे,
मुरली की धुन सुन सब ही भुलाई हैं।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *