यदि हम आज से 40, 50 वर्ष पूर्व की बात करें तो हम जानेंगे कि छठ पर्व बिहार राज्य का पर्व था। किंतु, यदि हम आज के दृश्य को देखते हुए बात करें तो आज छठ बिहार, उत्तर प्रदेश, भारतवर्ष ही नहीं वरन् पूरे विश्व का पर्व बन गया है। इस व्रत में गाया जाने वाला पारंपरिक गीत सवा लाख क साड़ी भींजें, केरवा जे फरेला घवध से, कांँच ही बांँस के बहंँगिया जैसे गीत जितना हमारे अंतर्मन को छू लेते हैं, उतना शायद दुनिया का कोई भी गीत नहीं। देश और दुनिया का कोई भी ऐसा गीत नहीं है, जो हमारे दिल के इतने करीब हो।

छठ पूजा का प्रारंभ कब से हुआ इस बारे में कुछ निश्चित प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है किंतु यदि हम पौराणिक कथाओं पर विश्वास करें तो उनके अनुसार सतयुग में भगवान श्री राम, द्वापर में दानवीर कर्ण और पांडवों की पत्नी द्रोपदी, राजा प्रियंवद ने सर्वप्रथम सूर्य की उपासना का व्रत छठ व्रत किया था। तो आज के लेख में हम सूर्य की उपासना का महापर्व छठ पूजा के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे-

1-
अपने पुत्र के प्राण की रक्षा हेतु राजा प्रियंवद ने किया था छठ का व्रत-

एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा प्रियंवद की कोई संतान नहीं थी, जिस कारण वे सदैव दुखी रहते थे। संतान की प्राप्ति हेतु उन्होंने महर्षि कश्यप से सलाह मांँगा। महर्षि कश्यप ने उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ करने की सलाह दिया राजा प्रियंवद ने पुत्रेष्टि यज्ञ को बड़े ही भक्ति भाव से कराया। आहुति के लिए बनाई गई खीर को महर्षि कश्यप ने राजा को उनकी पत्नी को खिलाने हेतु दिया और कहा इस खीर को अपनी पत्नी मालिनी को खिला दीजिए, इससे आपको अवश्य पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। खीर को खाने से उनकी पत्नी मालिनी ने एक मृत पुत्र को जन्म दिया। जिससे राजा प्रियंवद बेचैन हो उठे, वह अपने पुत्र के शव को लेकर शमशान पहुंँचे और वे अपने पुत्र के वियोग में अपने प्राणों को त्यागने का निर्णय लिये। उसी समय वहांँ पर महर्षि ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना अवतरित हुईं और उन्होंने प्रियंवद से कहा- हे राजन् – मैं सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठें अंश से उत्पन्न हुई हूंँ अतः मेरा नाम षष्ठी है। यदि तुम श्रद्धा और भक्ति के साथ विधि- विधान से मेरी पूजा करोगे तो तुम्हें पुनः संतान की प्राप्ति होगी। देवसेना के कहे अनुसार राजा प्रियंवद ने छठ माता का विधि- विधान से पूजा पाठ किया जिसके फलस्वरूप उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।

2-
वनवास काटकर लौटने के पश्चात राम और सीता ने किया छठ का व्रत-

यदि हम वाल्मीकि और आनंद रामायण की बात करें तो त्रेता युग में 14 वर्ष का वनवास काटकर जब प्रभु श्री राम अयोध्या लौटे, तब उन्होंने रावण के साथ युद्ध में होने वाले रक्तपात के पाप से मुक्त होने हेतु ऋषि- मुनियों की आज्ञा अनुसार राजसूय यज्ञ करने का निर्णय लिया ।इसके लिए उन्होंने मुद्गल ऋषि को आमंत्रित किया किंतु मुद्गल ऋषि ने मुंगेर आकर राम और सीता को उनके आश्रम में आने का आदेश दिया, और सूर्य की उपासना करने का सलाह दिया। उनके आदेश को शिरोधार्य करते हुए
ऐतिहासिक नगरी मुंगेर में प्रभु श्री राम और माता सीता ने छह दिन तक श्रद्धा और भक्ति के साथ छठ का व्रत किया था।

लोगों का ऐसा विश्वास है कि सर्वप्रथम छठ पूजा माता सीता ने बिहार राज्य के मुंगेर जिले में गंगा तट पर किया था। बाबा घाट के पश्चिमी तट पर आज भी माता के चरण मौजूद होने की बात की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि एक विशाल पत्थर पर आज भी माता-सीता के दोनों चरणों के निशान हैं। इसके अतिरिक्त शीला पट्ट पर सूप, डाला, लोटा, दिया इत्यादि के भी निशान मौजूद होने की बात की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि मंदिर का गर्भ वर्ष में 6 महीने तक गंगा के गर्भ में समाया हुआ रहता है, किंतु जब जलस्तर घटता है तब इस मंदिर में सीता जी के छठ करने के प्रमाण साफ-साफ दृष्टिगत होने लगते हैं। इसी कारण इस मंदिर को सीता चरण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के जलस्तर से बाहर आने के पश्चात यहांँ पर माता सीता के पद को देखने हेतु श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ लगती है।

3-पांडवों की राज-पाट की प्राप्ति हेतु पांचाली ने किया था छठ का व्रत-

महाभारत के अनुसार छठ महापर्व की शुरुआत द्वापर युग से मानी जाता है। जब चौपड़ के खेल में पांडव अपना सारा राज-पाट हार गए और उन्हें 12 वर्ष के बनवास तथा 1 वर्ष के अज्ञातवास हेतु वन-वन भटकना पड़ा तब उनकी पत्नी द्रोपदी ने उनके राज- पाट के वापसी हेतु सर्वप्रथम छठ महापर्व का व्रत किया था। जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें उनके राज- पाट की प्राप्ति हुई थी।

4-
उत्तरा ने अपने पुत्र की रक्षा हेतु किया था छठ का व्रत

महाभारत युद्ध के पश्चात अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा चिल्लाते हुए चली आ रही थी। वहांँ श्रीकृष्ण, पांँचों पांडव और कुंती सभी खड़े ह थे। उत्तरा ने श्रीकृष्ण से कहा, ‘मेरी रक्षा कीजिए, अश्वथामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रहार मेरे गर्भ पर किया है। मेरे पति अभिमन्यु की मृत्यु हो चुकी है, मेरे गर्भ में उनकी संतान है और ब्रह्मास्त्र एक बार चल जाए तो उसे रोका नहीं जा सकता है। यह ब्रह्मास्त्र मेरे इस अंश के प्राण ले लेगा। मुझे पांडव वंश बचाना है, मेरी रक्षा करिए।’
तब भगवान श्रीकृष्‍ण ने उत्‍तरा को छठी माता का व्रत रखने की सलाह दिया था। जी व्रत के फलस्वरुप उत्तर के गर्भ की रक्षा हुई।

5-
सूर्यपुत्र कर्ण ने किया था छठ माता का व्रत-

यदि हम महाभारत की मानें तो दानवीर कर्ण सूर्य के पुत्र थे और वे प्रतिदिन सूर्य की उपासना श्रद्धा और भक्ति के साथ करते थे। इस कथा के अनुसार सबसे पहले कर्ण ने ही सूर्य की उपासना किया था।

  • आखिर कौन है छठ मैया?

नवरात्रि का छठा दिन मांँ दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप को समर्पित है‌ इस दिन अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ सात्विक मन और कर्म से मांँ कात्यायनी के पूजन का विधान है। इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थापित रहता है।इस दिन साधक को अलौकिक तेज की प्राप्ति होती है। माता षष्ठी देवी को भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री माना गया है और इन्हें ही छठ मैया कहते है। ऋषि कात्यायन के यहांँ जन्म लेने के कारण इस देवी माँ को कात्यायनी के नाम से जाना जाता है। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं, गोपियों ने कृष्ण की प्राप्ति के लिए इनकी ही पूजा किया था।

ऐसा माना जाता है कि छठी मइया और सूर्य देव भाई-बहन हैं. इसलिए इस व्रत में छठी मइया के साथ उनके भाई सूर्य की पूजा का भी विशेष महत्‍व है।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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