वैमनस्यता करे जो जागृत
बातों को ना ग्रहण करो।
तुमको विद्रोही कर देंगी,
इनका तुरंत तुम दमन करो।

ना कभी देखो पर दोष को,
देखो सदा स्वदोष को।
घृणा,द्वेष से दूर रहो सदा,
सद्भावना, प्रीति से भर लो कोष को।

प्रतिशोध है तुमको लेना ,
कभी न मन में ठानो तुम।
सबकी अच्छाई को ले लो,
श्रेष्ठ जनों की बात को मानो तुम।

शूल के बदले फूल जो बोए,
वो ही पुष्पित – पल्लवित होगा।
विश्व मंच पर तुम चमकोगे,
कुटुंब गौरवान्वित होगा।

कभी किसी का अहित न करना,
उपकार सदा ही करना तुम।
हित कर ईश्वर अंश बन जाना,
भवसागर से तरना तुम।

हानि- लाभ ना कभी विचारो,
ईश्वर पर सब तुम दो डार।
सद्विचार हिय में उपजाओ,
नहीं फॅंसोगे कभी मझधार।

सद्भावना की करना खेती,
गोदाम तुम्हारा भर जाएगा।
अंतःकरण में बसी उष्णता,
होगी नष्ट हिय तर जाएगा।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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