होली पावन पर्व सुहाना,
फाल्गुन पूर्णिमा इसे जग जाना,

हिंदू संप्रदाय का जहां बसेरा,
वहां – वहां होली का डेरा।

धूम-धाम से इसे मनाते,
ईर्ष्या, द्वेष को दूर भगाते।

चैत्र शुदि प्रतिपदा दिन अगला,
पुरातन वर्ष नववर्ष में बदला।

होली नवसंवत का प्रतीक,
खुशी के रंग सभी हैं दीख।

होली रंग हुए कब एक ,
इससे जुड़ी मान्यताएं अनेक।

पूतना वध किए थे कान्हा,
तभी से था रंगोत्सव मना।

दूजी मान्यता यह कहलाई,
कान्हा ने रासलीला रचाई।

अगले दिन रंगों से खेलें,
रंग मिले तब से हम ले लें।

होलिका या होलाका पहला नाम,
होली , फगुआ अब सरेआम।

धुलेंडी, धुरड्डी ,धूलरेख भी,
धूलिवंदन , चैतबदी को देख भी।

टेशु फूल का रंग डलता था,
प्राचीन काल में यूं मनता था।

कहीं धूल व कीचड़ से लोग खेलें,
धुलेंडी नाम का अर्थ यह लेलें।

नारायण ने किया धूलीवंदन,
त्रेतायुग में हुआ अभिनंदन।

धुलीवंदन के अर्थ को जानो,
धूल से खेलो धूल को मानो।

चिकनी मिट्टी का गारा लगता था,
मुल्तानी मिट्टी का भी चलन था।

फागुन माह में यह है पड़ता,
तभी यह फगुआ/ फगवाह कहाता।

अलग-अलग इसके हैं दिन,
जान के तुम ना होवो खिन्न।

होलिका से रंग पंचमी तक, कहीं – कहीं है लोग मनाते।

भांग ठंडई साथ में पीते,
हरष- हरष के फगुआ गाते।

होली का दिन पांचवा रंग पंचमी,
रंगोत्सव इस दिन भी है धमी।

45 दिन मथुरा में खेलें,
बसंत पंचमी से होली ले लें।

यहां होली के हैं रुप अनेक,
रंगभरी ,छड़ीमार ,लट्ठमार देख।

डोल यात्रा भी होली को कहते,
डोल पूर्णिमा कहीं हैं सुनते।

झूले को हम खूब सजाते,
राधा – कृष्णा को इसमें
झूलाते।

होली का दिन मुख्य है तीन,
यदा-कदा इससे है भिन्न।

प्रथम दिवस होलिका है होता,
दूजा दिवस है धूलीवंदन।

तीजा दिन है रंग पंचमी,
जान लो इसको सारे जन- जन।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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