गर्भावस्था में जब मैं आई,
घर में बड़ी ही खुशियाॅं लाई।
लड़का होने वाला है जी,
चारो तरफ़ से मिली बधाई।

माॅं के गर्भ से जब मैं निकली,
बेटी बनकर बोझ हुई।
साल- महीना जब बीता तो,
घर में बड़ी नोक-झोंक हुई।

शैशवावस्था में जब मैं बोली तो,
माॅं ने तुरंत ही झिड़क दिया।
बच्चे ज्यादा नहीं बोलते,
ऐसा माॅं ने सबक दिया।

बाल्यावस्था में जब आई
बोलने का प्रयत्न मैं की।
बड़ी हो रही ,गंभीर रहो अब,
फिर से थी ना यत्न मैं की।

किशोरावस्था प्रारंभ हुई जब,
तब सोची कुछ बोल सकूॅं।
मन में जो तूफ़ान भरा है ,
मैं उसको कुछ खोल सकूॅं।

हुई युवा भाव हुए प्रस्फुटित,
मन में जो था दबा हुआ।
बाहर आने को थे आतुर,
पर फिर से ना बदा हुआ।

सुन आवाज़ माॅं झटपट आई,
जोर की थी वह डाॅंट लगाई।
दूजे घर तुमको है जाना ,
इतना ठीक नहीं बेहयाई।

ब्याह हुआ ससुराल गई जब,
कुछ बोल सकूॅंगी हुई तसल्ली।
सासू माॅं तब आकर बोलीं,
तेरा पीहर ना यह लल्ली।

घर- गृहस्थी की उठा ली ज़िम्मेदारी,
बन गई थी अब मैं महतारी।
सोची, बोल सकूॅंगी मन की बात ,
अब ना कोई करेगा अघात।

पतिदेव जी तभी ही आकर,
बोले बिल्कुल चुप रह तू।
दुनिया को है तू क्या जाने,
बिल्कुल ना अब करना चूॅं।

घर जब तंगी से था गुज़रा,
घर से बाहर मैं थी आई।
वही पुरानी रीत यहाॅं भी,
मन की बात मै बोल न पाई।

काम यदि करना चाहो तो,
आंख कान को बंद करो।
अधिकारी जैसा है कहता,
हरदम ,वह ना चंद करो।

आ गई थी अब प्रौढ़ावस्था,
सोची अब आ गई व्यवस्था।
मिल-जुल कर अब बात करेंगे,
सोच हृदय मेरा था हॅंसता।

तब तक आ गया मेरा लाल,
चेहरा बना लिया विकराल।
बोला बिल्कुल चुप रहो माॅं,
तुम्हें इन बातों से क्या लेना।

वृद्धावस्था लो भाई आ गई,
जो ना किसी के मन को भा गई।
सोची ,अंत समय है अब बोलूॅंगी,
हर गुत्थी को अब खोलूंगी।

चौतरफा आई एक आवाज़,
मानो गिरा हो मुझ पर गाज।
अब आराम की तुम्हें ज़रूरत,
ना अब कोई करो बकवास।

मरणासन्न अवस्था में अब आई,
मन की बात कोई कह ना पाई।
सबने चुप रहने को बोला,
अब थी चुप्पी बड़ा तड़पाई।

आत्मा गृह में बात दबी थी,
कुछ सामान्य कुछ खास जभी थी।
अब मैं भी कुछ बोलना चाहूॅं,
दबे राज़ थी खोलना चाहूॅं।

पर अब समक्ष यमराज खड़े थे,
लेकर भैंसा साथ खड़े थे।
मैंने कहा थोड़ा कुछ बोल लूॅं,
मन की गुत्थी कुछ तो खोल लूॅं।

यमराज ने मुझको घुड़का,
सुनकर जिसको अंग न फड़का।
ध्वनि साॅंस सब कुछ अब चुप था,
अब सबका मन व्यथा से दहका।

जहाॅं से आई पहुॅंच गई वहाॅं,
बात न कर सकी कुछ भी मैं यहाॅं।
सबने डाॅंटा और दुत्कारा,
अवसर मिला जिसे भी जब जहाॅं।

साधना शाही ,वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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