लेखिकामंजुला श्रीवास्तव मैम द्वारा रचित मंजुल कहानियाॅं 20 कहानियों का संग्रह है ,ये कहानियाॅं रोचकता ,लेखक -पाठक एवं श्रोता के मध्य यथोचित संबद्धता बनाए रखने में पूर्णतया सक्षम हैं। कहानियों को पढ़ते समय ज़्यादातर कहानियाॅं ऐसी प्रतीत होती हैं कि लेखिका के आस-पास की घटनाओं पर ही आधारित हैं। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि बहुधा कहानियाॅं यथार्थ को आदर्श का आवरण पहनाई हुई सी जान पड़ती हैं। इन कहानियों पर एक तरफ़ जहाॅं जैनेन्द्र जी का प्रभाव दृष्टिगत होता है जिनमें व्यक्ति, समाज और जीवन की समस्याओं का चित्रण किया गया है,समस्याओं का समाधान सहदयता के वातावरण में किया गया है। वहीं दूसरी तरफ़ उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी की भाॅंति अपनी सरल, सरस और साहित्यिक भाषा के साथ लोकभाषा ,मुहावरे एवं लोकोक्तिययों के प्रयोग से कहानी को स्वाभाविक बना दिया गया है। जिसके लिए कहानी में भावानुकूल पात्रों का चयन किया गया है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार “नदी जैसे जलस्रोत की धार है, वैसे ही कहानी का प्रवाह हैं” प्रस्तुत कहानी संग्रह रविंद्र नाथ टैगोर जी के इस कथन पर भी खरी उतरती है।
कहानी मानव-जीवन का वह खण्ड चित्र है जो सरस सरल एवं सारगर्भित होना चाहिए , जो मुझे यदा-कदा नहीं देखने को मिला।
अब मैं आपको बताना चाहूॅंगी कि मंजुल कहानियाॅं में मुझे कहानी की कौन-कौन सी विशेषताएं और तत्व देखने को मिले और किस तत्व की कमी लगी।

1- अभिशप्त पितृ दिवस
प्रस्तुत कहानी समाज को आईना दिखाती हुई एक संवेदनात्मक कहानी है जिसमें लेखिका ने यह दिखाना चाहा है कि आज आधुनिकता की अंधी दौड़ में किस प्रकार रिश्तों को ताख पर रख बच्चे अपने कर्तव्यों को भूलकर स्वार्थी हो गए हैं, इसी के साथ कोरोना काल में जीवन किस प्रकार प्रभावित हुआ ,इसे भी दिखाया गया है। और इस तरह प्रस्तुत कहानी एक ऐसे पिता की कहानी है जो अपने ही बच्चों द्वारा उपेक्षित और प्राकृतिक त्रासदी से पीड़ित हैं, किंतु अंत तक किसी भी प्रकार की शिकायत न कर इस उपेक्षा और दुत्कार को अपना भाग्य समझ सहर्ष स्वीकार किए हुए हैं।
इस तरह यह कहानी हमें यह बता रही है कि माॅं- बाप कैसे बच्चों की गलतियों पर पर्दा डालकर, अपनी वेदना को छुपाकर अपने कष्टमय जीवन को हॅंसी का चोला पहनाकर जीते हैं। और वही बच्चे बड़े होने पर किस तरह उनके माॅं-बाप को बोझ समझकर अपने घर ही नहीं अपनी ज़िंदगी से भी बाहर निकाल देते हैं।

2-दूसरी कहानी है बेला-
इस कहानी में लेखिका ने जिस तरह की राजनीतिक गतिविधियों का चित्रण किया है वैसी गतिविधियाॅं सामान्यतः नहीं घटित होती हैं। अतः इस कहानी में मुझे घटना और स्थान के तारतम्यता की कमी नज़र आई।

3-दंश
प्रस्तुत कहानी संयुक्त परिवार पर आधारित कहानी है।
जिसमें ,विषयवस्तु / कथानक, चरित्र- चित्रण, संवाद, भाषा शैली, वातावरण और उद्देश्य सभी तत्व विद्यमान हैं। भोजपुरी के शब्दों एवं मुहावरों के प्रयोग से कहानी में स्वाभाविकता आ गई है ।
इसी के साथ अम्मा का तोहरे देह में कीड़ा पड़ी कीड़ा कहना और सुनित का ट्रक दुर्घटना में अपनी इह लीला समाप्त करना एक तरफ़ जहाॅं अंधविश्वास को दृष्टिगत कर रहा है वहीं दूसरी तरफ़ मृदुला के मन की व्यथा को भी उजागर कर रहा है। उसके अंदर के इस मलाल को उजागर कर रहा है कि काश! इस तरह की बात अम्मा न कहीं होतीं तो आज उसका पति और अम्मा का बेटा ज़िंदा होता, उसकी माॅंग में चटक सिंदूर विराज रहा होता।

4-मन-गंगा
मुझे ऐसा कहते हुए खेद हो रहा है किंतु मुझे जो प्रतीत हुआ मैं वही लिख रही हूॅं कि- मन- गंगा कहानी ,कहानी के शीर्षक से मेल खाती हुई मुझे नहीं दिखाई पड़ी।

5-ग्रीन चिली
ग्रीन चिली कहानी यद्यपि कि एक लघु कथा है लेकिन इसने बिहारी की भाॅंति गागर में सागर को भरा हुआ है, जो कि साहित्य समाज का दर्पण है उक्ति को पूरी तरह चरितार्थ करती हुई एक कहानी है । प्रस्तुत कहानी में अपनी संस्कृति एवं सभ्यता को छोड़कर पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने की जो होड़ लगी हुई है उसे भली-भांति दिखाया गया है।यह कहानी मुझे बड़ी रोचक लगी।

6-मुहावरा
मुहावरा कहानी एक ऐसी कहानी है जो हमें आज के 10 से 15 साल पहले गाॅंव की क्या स्थिति थी, उसको बताने में पूरी तरह समर्थ है। कहानी में पीले रंग का बल्ब, लालटेन की बात की गई है जो कि आज से 10 -15 साल पहले गाॅंव के लोगों का रहन- सहन कैसा था, उसको बताने में पूर्णतया समर्थ है ।इसी के साथ मुहावरा कहानी के अंत में बारिश में मोहल्ले के चाचा ,ताऊ ,भैया सभी लोग इस ताक में कमरकस कर खड़े थे कि कैसे बिना मर्ज़ी के एक बेटी को मोहल्ले से लेकर ये लोग जा सकते हैं। यह वाक्य गाॅंव में विद्यमान एकता को प्रदर्शित कर रहा है। जो आज कहीं विलुप्त होती जा रही है ।

7-ए अम्मा !
यह कहानी तो मेरे अंतर्मन को छू गई। इस कहानी में मृदुला का अपने ससुर के चरित्र पर शक करना, अपनी सास से अपने ससुर के चरित्र के बारे में बताना और फिर सास के द्वारा मृदुला के ऊपर नाराज़ न होकर बड़े ही सहृदयता से यह बताना कि,यह जो तुम्हें प्रतीत हो रहा है कि ये मेरे जाने के बाद प्रति संध्या किसी औरत से बात करते हैं, तो वो किसी औरत से बात न करके अपनी गैया – मैया से बात करते हैं। क्योंकि ,तुम्हारे ससुर अपनी गाय को किसी मनुष्य से कम नहीं मानते हैं, यह सब कुछ कहानी को एक तरफ़ जहाॅं स्वाभाविकता, सरसता ,रोचकता एवं प्रभावोत्पादकता स्थापित करने में सक्षम जान पड़ रहा है ,वहीं दूसरी तरफ सास -बहू के रिश्ते को मजबूती, आत्मीयता, अपनापन भी प्रदान कर रहा है ।इसी के साथ- साथ यह कहानी यह भी बताने में सक्षम है कि आज समाज से किस प्रकार मानवता ख़त्म होती जा रही है। जबकि ,यदि हम आज से 10-20 साल पहले की बात करें तो मनुष्य, मनुष्य ही नहीं वरन् पशु पक्षी – से भी मनुष्य की भाॅंति ही प्रेम करते थे, उनसे आत्मीयता एवं अपनापन दिखाते थे।

8-ये उन दिनों की बात है-
इस कहानी में जिस नई नवेली दुल्हन के संकोचपूर्ण व्यवहार का चित्रण किया गया है वह पूर्णतया स्वाभाविक है और दुल्हन ने जो वॉशबेसिन में पैर धोने का काम किया है उसे पढ़कर शायद ही कोई होगा जो अपनी हॅंसी को रोक सके। किंतु कहानी के अंत में पति का दुर्घटना का शिकार हो जाना कहानी को मार्मिक बना देती है। इस प्रकार यह कहानी जहाॅं प्रारंभ में हमें हॅंसाती है ,गुदगुदाती है वहीं अंत में हमारी आंखों को नम कर देती है। हृदय को द्रवीभूत कर देती है।

9- मृदुला
प्रस्तुत कहानी कहानी एक कर्मठ ,ज़िम्मेदार, परिश्रमी, ईमानदार शक्षिका एवं महिला की कहानी है। जिन्होंने अपना पूरा जीवन विद्यालय परिवार के लिए समर्पित कर दिया और अब ,जब वह सेवानिवृत्त हो गई हैं ।उनके जीवन के 30 – 35 साल एक चलचित्र की भाॅंति उनके मानस पटल में चल रहा है जो कि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है अतः यह कहानी मुझे सर्वाधिक स्वाभाविक कहानी लगी।

10-मेरी पहली हवाई यात्रा-
संस्मरण पर आधारित प्रस्तुत कहानी मुझे थोड़ी बोझिल सी एवं भटकती सी लगी क्योंकि कहानी की मुख्य विशेषता है संक्षिप्तता एवं सारगर्भिता, प्रस्तुत कहानी में मुझे कहानी की यह विशेषता कम दृष्टिगोचर हुई। इसके अलावा यह कहानी ,कहानी से हटकर एक संक्षिप्त उपन्यास सी लगी। यद्यपि की कहानी के पात्र, चरित्र चित्रण, स्थान ,भाषा- शैली सब कुछ कहानी के अनुरूप हैं, किंतु कहानी को विस्तार देना मुझे कहीं न कहीं कहानी का जो मुख्य तत्व है संक्षिप्तता उसे तोड़ती हुई सी लगी।

11-हतभाग्य
यह वह कहानी जो मेरी आत्मा को झकझोर कर रख दी । इस कहानी ने मुझे पूरी तरह द्रवीभूत कर दिया। प्रस्तुत कहानी में आज के समाज में विद्यमान जिस बर्बरता, मनुष्यता एवं मानवता को शर्मसार करना ,वर्ग भेद को उजागर किया है , वह किसी भी सहृदय को द्रवित करने में सक्षम है। इसी के साथ कहा जाता हैं – समय के पूर्व और भाग्य से अधिक किसी को कुछ भी नहीं मिलता इस उक्ति को भी प्रस्तुत कहानी में पूरी तरह चरितार्थ किया गया है ।इस कहानी में यद्यपि कि कॉलोनी के सारे लोग सब्ज़ी वाले के पति के मरने पर सिर्फ़ तमाशाई बने देख रहे थे लेकिन उन तमाशाइयों में राधिका और उसका बेटा उस सब्ज़ी वाले की मदद करना चाह रहे थे। किंतु विधाता की विडंबना तो देखिए उस दिन उन दोनों के पास कुछ भी नहीं था और वो चाहकर भी अफ़सोस जताने के सिवाय सब्ज़ी वाले के लिए कुछ भी नहीं कर पाए इसे ही कहते हैं हतभाग्य।

12-अब तुम आज़ाद हो-
प्रस्तुत कहानी परतंत्रता की ज़ंजीरों में जकड़ी एक स्वतंत्र नारी का चित्रण है। जो कहने को तो स्वतंत्र है किंतु अपने बड़े- बुजुर्गों के समक्ष अपनी अनुभूति को व्यक्त कर एक नकारात्मक सोच, नकारात्मक दृष्टिकोण का शिकार हो गई थी ।जो उसकी वेदना को चरम पर पहुॅंचाने तथा स्वतंत्र भारत में महिला की दयनीय स्थिति को दिखाने का कार्य कर रही है।

13-उसकी कहानी –
यह कहानी मुझे इस पुस्तक की सर्वोत्कृष्ट कहानी लगी। क्योंकि, प्रस्तुत कहानी में प्रारंभ में एक बच्चे के मज़बूरी का नाजायज़ फायदा उठाकर उसके शोषण और उसके साथ किए गए दोहरे व्यवहार को दिखाया गया है , मध्य में घर में शांति बनाए रखने हेतु नानी का दोहरा व्यक्तित्व, त्याग और अपनी नातिन के प्रति प्रेम और मजबूरी तथा अंत में आधुनिकता के नाम पर अभद्र, उदंड तीसरी पीढ़ी की बहू के द्वारा दामाद का अपमान करना उससे आहत होकर घर के प्राणप्रतिष्ठित भगवान को मंदिर में रखवाना और फिर घर के सारे नियम- कानून, संस्कारों का ध्वस्त होना, आज के समाज की जीती जागती तस्वीर है।
वैसे तो पहले से भी मेरी यही सोच है कि किसी भी शर्त पर अपने बच्चों को अपने किसी रिश्तेदार के यहाॅं नहीं छोड़ना चाहिए किंतु इस कहानी को पढ़ने के पश्चात मेरी सोच और भी दृढ़ हो गई कि, किसी भी स्थिति में अपने बच्चों को अपने किसी भी रिश्तेदार के यहाॅं लंबे समय के लिए नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि जब बच्चे कभी-कभी जाते हैं तो दुलारे होते हैं किंतु जब वही बच्चे मज़बूरी में जीवन यापन करने के लिए जाते हैं तो बोझ हो जाते हैं, जहाॅं उन्हें हर पल अपमानित होना पड़ता है, दुखी होना पड़ता है और अंदर ही घुट- घुटकर जीना पड़ता है।

निष्कर्ष तौर पर यही कह सकते हैं कि यह कहानी संग्रह समाज को आईना दिखाती हुई एक कहानी संग्रह है जिसमें हमें सामाजिक ,राजनैतिक, संस्मरणात्मक ,वर्ग भेद दोहरे और छलावे के रिश्ते, अंधविश्वास जैसे विषयों पर कहानियाॅं पढ़ने को मिलेंगी ,जो एक तरफ़ यदि हमें गुदगुदाएंगी , हसाएंगी,हमारा मनोरंजन करेंगी तो दूसरी तरफ़ वो हमारी आंखें नम कर देंगी, हमें आज के सामाजिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक व्यवस्था के प्रति अफ़सोस ज़ाहिर करने पर बाधित करेंगी
और अंततः
प्रस्तुत पुस्तक के लिए मैं यही कहना चाहूंगी कि-
प्रस्तुत कहानी संग्रह कवि बिहारी की भाॅंति समासिकता, कल्पना की समाहार शक्ति ,देशज भाषा, अद्भुत बिंब प्रयोग कर गागर में सागर भरने जैसी है।

समासिकता ,कल्पना की समाहार शक्ति है अद्भुत।
इसका देशज भाषा ,बिम्ब प्रयोग,
पाठक को करता उद्बबुध।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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