1-मुक्तक

जब तक तन में सांँस था,
कीमत किया ना कोय।
उड़ गया पंछी खाली चोला,
सिर धुनि- धुनि के अब रोय।।

जीते जी दो बोल न दीन्हीं,
किए मरने पर बड़ा भंडारा।
ठंडा पानी पिला- पिलाकर,
मानो चलवाए हों वो अंगारा।

शक्कर सी मीठी बोली है,
नीम सी उनकी करनी होय।
कहे साधना ऐसे जन से तो ,
पार पा सके कभी न कोय।

देख के दुश्मन की मक्कारी,
जिसका खू़न नहीं है खौला।
देश का ना वो सच्चा नागरिक,
उसको कहते हैं पागल बौला।

लड़ते रहते नित जिस ठौर ,
वहांँ भगवान नहीं हैं रहते।
प्रेम- विश्वास जहाँ
करे बसेरा,
वे जन कभी दुख को नहीं सहते।

हाथों में मेहंदी है रची,
माथे पर सज गई बिंदिया।
आज बनी है दुल्हन देखो,
बहना, बेटी और दीदिया।

सज गई डोली सजे बाराती,
सज गया देखो साराटोला।
बन्नी को लेने की खा़तिर,
बन्ना लेकर आया है डोला।

बन्नी के चांँद से मुखड़े पर,
मैंने तो ग़ज़ल लिख डाला है।
उसके कजरारे नैनो ने देखो,
मुझ पर जादू कैसे डाला है।

2-
ज्ञानी, अज्ञानी और अभिमानी(कविता)

दंभ करे कभी ना ज्ञानी,
वह रहता सदा ही धीर।
ज्ञानदीप जला के धरा पर,
बनता वह सबका ही पीर।

अज्ञानी को यदि समझा दो,
वह भी तस्वीर बदल दे।
अंतर्मन का तम हर करके,
जग को एक सच्चा अदल दे।

अभिमानी एक शूल है ऐसा,
समझाए से वो नहीं समझे।
समझाने की यदि हुई आवृत्ति,
वह किंवाछ सा उससे उलझे।

समय ही बस उसको समझाए,
देता उसे समय ही सीख।
वही घमंड को चूर है करता,
तब मांँगे वो समय से भीख।

मीत बनाओ ज्ञानी को तुम,
अज्ञानी भी कुछ नहीं बुरा है।
पर अभिमानी बड़ा ही घातक,
मानो वो कुंभ सुरा ही सुरा है।

सुरा के संग अनैतिकता है,
नैतिकता इससे दूर है भागे।
यह समाज कलुषित करती,
इसके होते ना कोई है जागे।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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