1-
फूलों सा सदा खिले रहो,
कभी भी मुरझाना नहीं।
डर के साए में कभी भी,
जीवन को बिताना नहीं

खुशी को ओढ़ो बिछाओ,
गम को घर बताना नहीं।
कविंदु के तुम आन बनना,
कभी मान को घटाना नहीं।

पूनम के जैसा काज करना,
अमा को मीत बनाना नहीं।
ज्योतित हो व्यक्तित्व तेरा,
कभी तीरगी लाना नहीं।

खुशियों से भरा हो आंँगन,
गम को कभी घुसाना नहीं।
क्लेश यदि आना जो चाहे,
इरादे के संग जाना नहीं।

जन्मदिन सदा शुभ हो तेरा,
कभी इसको है बताना नहीं।
खुशियों के दीपक के अंदर,
प्रेम की वर्तिका भुलाना नहीं।

आशीष का हो तेल उसमें,
बदगोई कभी पाना नहीं।
तू है हमारा प्यारा सा मुन्ना,
कभी दूर हमसे जाना नहीं।

2-

कौन कहता है बेगाने हमको देख जलते हैं,
अजी!हमारे अपने ही वो खंजर हैं ,जो सीने में डलते हैं।

आंँखों में है समंदर बसता, दिल में बड़ी बेचैनी है,
सपने तो सारे टूटे हैं, जैसे बिखरी हुई रमैनी है।

कैसे ना कह दूंँ ऐ हमदम!तूने ही तो सारे लूटे हैं।
सपनों को रौंदा इतना, एक-एक सभी टूटे हैं।

अपने जो करते वार वो ना सहा जाता है,
घर में छुपा जो बैरी वो खुशियों को खो जाता है।

पूनम में जो ढूंँढें अमावस उनके भी क्या कहने,
खुशी की झूमती बयार उन्हें देख औंधे मुंँह लगी बहने।

नफ़रतों का यह फ़साना हमें दर्द बड़ा देता है,
प्यार करने वाले दिलों को यह गर्द सड़ा देता है

3-

बेवफा प्यार के ना तू क़ाबिल ,
अश्कों के दरिया में तूने डुबाया।

प्यार करती थी मैं दिलो जान से,
तू उसको समझ क्यों न पाया?

छद्मवेशी को अपना तू समझा,
और अपनों को सदा ही ठुकराया।

छोटी से छोटी बातों को तूने,
तूल देकर के मुझे है रुलाया।

कल की बातों को जैसे ही भूलूंँ,
नया परपंच तूने है बनाया।

तुझ पर मैंने किया था भरोसा,
करके टुकड़े उसे तू गिराया।

भूलना तुझको जितना मैं चाहूंँ,
आगे आए तेरी करतूतों का साया।

तू छलिया फ़रेबी ऐ साजन,
ज़िंदगी को जहन्नुम बनाया।

मेरी आंँखों में तिरते थे सपने,
उनकी कश्ती को तूने डुबाया।

ए ख़ुदा! आज तुझसे मैं पूछूंँ,
ऐसी फितरत क्यों उसकी बनाया।

4-

खुशी मुझसे रूठ गई दर्द पास- पास रहता है।
खुशी की बयार दिखती दुख का अंधण बहता है।।

होठों पर कहकहे रहते दिल उदास रहता है,
कोई अज़ीज़ मुझसे रूठा ना वो पास रहता है।।

शून्यता का साथ मेरा पूर्णता ना गहता है।
रंज आके थूनी गाड़ा प्रसन्नता को जाओ कहता है।।

वेदना का सागर मेरी आंँखों में होके बहता है।
पर न कोई देख पाए चुपचाप ही सब सहता है।।

अश्कों को इतना हूँ पी कि सुध-बुध नहीं अब रहता है।
मतलबी दुनिया में कब मोहब्बत का हवा बहता है।।

घुँट- घुँट के गैरत जी रहा है बेगैरत कहकहे भरता है।
सच्ची मोहब्बत मिलती नहीं छलावा का घर ही सजता है।

5-

दिल की गहराई में जो याद है क्या उसे कभी धरते हो।
मेरी यादों को याद कर कभी मुझ पर भी मरते हो?

राहों में मेरी बो के काँटे क्या ख़ुदा से डरते हो?
कभी साल महीने में भी मेरे लिए आहें भरते हो?

मेरे सपनों के करके टुकड़े बड़े दंभ तुम तो भरते हो।
मैं तो तुम पर जांँ निसार करूंँ,
तुम पतझड़ सा मुझ पर झरते हो।।

मेरी हर ख्वाहिशें दफ़न हुई हैं,
तुम बेगानों पर ही सदा मरते हो।
तुम्हारा मुझसे न राब्ता कोई,
खुशियांँ औरों के घर में धरते हो।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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