हिंदी साहित्य के इतिहास में अनेकानेक साहित्यकार हुए हैं जिन्होंने अपनी कविताओं, कहानियों,गीतों, खंड काव्यों, महाकाव्यों आदि विधाओं के माध्यम से साहित्य की देवी को अपना श्रद्धा सुमन अर्पित कर यश, मान,प्रतिष्ठा स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किये।

जिस प्रकार जूही, चमेली, रातरानी, बेला, मोगरा आदि पुष्प अपनी ख़ुशबू से वातावरण को सुगंधित करते हैं, उसी प्रकार हिंदी साहित्य के इतिहास में अनेकानेक कवि भी अपनी रचनाओं से जनमानस तथा धरा को सुवाषित करते हैं। जिन साहित्यकारों के सम्मुख अनायास ही हमारा मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है। फिर भी, जिस प्रकार गुलाब को फूलों का राजा माना जाता है, उसी प्रकार मैं साहित्यकारों में भक्त शिरोमणि कबीरदास को कवियों का शिरोमुकुट मानती हूँ। आज करीब 600वर्ष पश्चात भी उनकी कविता काव्य-रसिकों को रसमग्न करती है और भक्तों, समाज सुधारकों को भाव-विभोर करती है। यही भक्त शिरोमणि कबीरदास मेरे प्रिय कवि हैं।

इनका जन्म कब हुआ, यह ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है। एक मान्यता और ‘कबीर सागर’ के अनुसार उनका सशरीर अवतरण सन् 1398 (संवत् 1455), में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को ब्रह्म मूहूर्त के समय लहरतारा तालाब में कमल पर हुआ था। जहांँ से नीरू नीमा नामक दंपति उठा ले गए थे और उनका पालन-पोषण किये।

जबकि एक दूसरी मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि कबीर की मांँ ने बड़े ही चमत्कारिक ढंग से गर्भ धारण किया था। उनकी मांँ धर्म-कर्म में आस्था रखने वाली एक विधवा ब्राह्मणी थीं।जो अपने पिता के साथ तीर्थ यात्रा पर गई थीं और एक तपस्वी के यहाँ निवास कर रही थीं। तपस्वी उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिए। जिस आशीर्वाद के फल स्वरुप उन्होंने कबीर को जन्म दिया। चूँकि वह विधवा थीं अतः लोकलाज के भय से अपनी संतान को लहरतारा नदी के तट पर छोड़ आईं। जहांँ से उन्हें नीरू नीमा नामक जुलाहे अपने घर ले गए और उनका परवरिश किये।

कबीर दास एक ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्हें हिंदू और मुसलमान दोनों ही अपना साहब मानते हैं। कबीर के अपने धर्म की बात करें तो वो स्वयं को न हिंदू मानते हैं,न मुसलमान मानते हैं बल्कि एक इंसान मानते हैं। अतः मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारा, गिरजाघर, पगोड़ा ,पूजा, जप,तप,नेम, रोज़ा किसी में भी उनकी आस्था नहीं थी। उनके अनुसार भगवान को पाने का एक मात्र रास्ता है मानव धर्म को अपनाना। उनका मानना था भगवान तो जर्रे-जर्रे में, कण-कण में, हमारे पास, आपके पास, सबके पास विद्यमान हैं। अतः उसे मंदिर, मस्ज़िद, देवालय, गुरुद्वारा, गिरजाघर में ढूंँढने से कोई फ़ायदा नहीं है। उसे ढूंँढ़ना ही है तो अपने अंतर्मन में, अपने सांँसों में ढूंँढ़ें। कबीर एक ऐसे दिव्य आत्मा थे जिससे हिंदू और मुसलमान दोनों ही प्रभावित थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। ये एक सिद्ध योगी थे।

ये रामानंदाचार्य जी को अपना गुरु बनाना चाहते थे। किंतु, रामानंदाचार्य इन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं थे, जिसकी वज़ह से ये एक दिन रामानंद के आश्रम की सीढ़ियों पर लेट गए। जब रामानंद जी प्रातः काल गंगा स्नान के लिए तो उनका पैर कबीर दास की छाती पर पड़ा। स्वामी जी ने उन्हें उठाया और कहा राम नाम कहो बच्चा तुम्हारा कल्याण होगा। बस उसी दिन से कबीरदास राम- नाम का माला जपने लगे। वो रामनामी दुपट्टा ओढ़ने लगे। नगर,गाँव,गली, चौराहे पर भ्रमण करने लगे।

एक दिन कुछ लोगों ने उनसे पूछा कि तुम तो मुसलमान हो फिर रामनामी क्यों ओढ़ते हो? राम- नाम का जाप क्यों करते हो? तब कबीरदास ने बताया वो रामानंद जी के शिष्य हैं। इस पर लोगों ने रामानंद जी के पास जाकर पूछा, तब रामानंद जी ने बताया हांँ वह मेरे पास मेरा शिष्य बनने के लिए आया था लेकिन मैंने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया। दूसरे दिन कुछ लोगों ने कबीरदास को श्री रामानंद जी के आश्रम में लेकर गए। रामानंद जी समाधि लगाए हुए थे। जब रामानंद जी समाधि से उठे तब उन्होंने कबीर से पूछा, मैं तुम्हें कब अपना शिष्य बनाया? तो कबीर दास ने सीढ़ियों पर वाली घटना को उन्हें बताया और कहा वहीं पर मुझे गुरु मंत्र मिल गया था। इस पर रामानंद जी ने कहा कि मैं इसे मैं शिष्य नहीं बनाया था किंतु आज और अभी से यह मेरा शिष्य हो गया ।

क्योंकि, समाधि के दौरान मैं ईश्वर का मानसिक पूजन कर रहा था। उन्हें स्नान आदि कराने के पश्चात मैं पुष्प का माला पहना रहा था, जो कि माला छोटी पड़ रही थी। तभी उसने कहा डोरवा तोड़के पहिना द। मेरी समाधि की दशा में इसने मेरी कठिनाई को दूर किया तथा आज से यह मेरा शिष्य हो गया। कबीर दास की गुरु भक्ति बेमिसाल थी। वो अपने गुरु को सर्वाधिक सम्मान देते थे। जिसका उन्होंने ज़गह पर उल्लेख किया है। गुरु की महानता को बताते हुए उन्होंने कहा है-

सद्गुरु के परताप तैं, मिटि गया सब दुःख द्वंद्व ।
कह कबीर दुविधा मिटी, गुरु मिलिया रामानंद ।।

उन्होंने अपनी रचनाओं में गुरु को ईश्वर से भी महान बताया है। गुरु की महानता बताते हुए उन्होंने एक स्थल पर कहा है-

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काको लागूंँ पांँय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।

उनके कुछ-कुछ पदों को पढ़ने से ऐसा भान होता है मानो उनका भगवान से साक्षात्कार हो गया हो। उन्होंने भगवान को चुनौती देते हुए अपने दोहों में लिखा है –

काशी मुए ते मुक्ति होत है,मोर, घोर अरू चोर।
जो कबिरा कासी मुआ, रामहिं कौन निहोर ।।

इसलिए वे काशी छोड़कर मगहर चले गए थे। जबकि लोगों का ऐसा विश्वास है कि काशी में मरने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है और लोग अन्य जगहों से काशी में मृत्यु को प्राप्त करने के लिए आते हैं।

किंतु कबीर वो अनोखे व्यक्तित्व थे जो काशी छोड़कर मगहर चले गए।

उनका मानना था कि अज्ञानी के अंदर ही अहंकार का वास होता है। मनुष्य के अंदर ज्ञान का दीपक जलते ही उसके अंदर का मोह, माया, द्वंद्व ,कुंठा, अहंकार सब कुछ क्षण भर में दूर हो जाता है। आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं रह जाता, एक सथल पर उन्होंने कहा है-

जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहर- भीतर पानी।
फूटा कुंभ जल जलहिं समाना, यह तथ कहत गिआनी।।

कबीर दास एक निर्गुण भक्त, कवि साहित्यकार होने के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। वे मानव के अंतर्मन और विचारों की पवित्रता पर सदैव जोर देते थे। वो कहते थे कि प्राणी, जाति से नहीं कर्म से महान होता है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदू तथा मुसलमान दोनों को सचेत किया। एक तरफ़ उन्होंने जहांँ हिंदुओं के मूर्ति पूजा पर कुठाराघातकरते हुए कहा-

पाहन पूजै हरि मिलै, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते ये चक्की भली, पीस खाय संसार।।

वहीं दूसरी तरफ़ मुसलमानों पर भी उन्होंने कुठाराघात किया और कहा-

काकर, पाथर जोरि कै, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।।

इन्होंने जन सामान्य को समाज सुधार के लिए, सुखी जीवन के लिए, भक्ति और प्रेम की राह दिखाया। आप के प्रेम से, ईश्वर में भक्ति से, समाज में सुख एवं शांति हो यही उनके जीवन का उद्देश्य था। कबीर के दोहों की प्रासंगिकता कल भी थी, आज भी है और सदैव रहेगी। उन्होंने संसार को समझाते हुए कहा –

चाकी चलती देखि कै, दिया कबीरा रोइ।
दोइ पट भीतर आइकै, सालिम बचा न कोई॥

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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