ना कोई है जग में रहता,
सदा कुबेर की खान।
छप्पन भोग जो एक दिन खाए,
दुर्भिक्ष रूखी- सूखी का लो जान।

चाहे जितना ऊपर चढ़ लें,
एक दिन नीचे आना है।
ऊपर ना कोई सदा है रहता,
नीचे ही प्राण गॅंवाना है।

फिर काहे का दंभ है मानव,
और काहे का द्वेष।
एक दिन सारा तज़ के धरा पर,
जाना एक ही देश।

सुनो ऐ भैया! सुनो ए बाबू!
फिर काहे का दर्प,
मिट्टी से बने मिट्टी में मिलेंगे,
कर ले जीवन में तर्प।

जिस दिन टूट बिखर जाएंगे,
पल भर घर में ना होगा ठिकाना।
जिसकी खातिर किए छल- कपट,
जीवन की सच्चाई ना जाना।

ईश्वर ने जो कुछ भी दिया है,
सीखो तुम उस में खुश रहना।
वक्त- बेवक्त समक्ष जो आए,
सबको ही है एक रोज
गुज़रना।

दुख- व्यवधान यदि आए तो,
उससे ना मुझको डर लगता।
अपना जब कोई रंग दिखाए,
वह ही विह्लल मुझको करता।

सागर यदि विकराल रूप ले,
तत्पर हो मुझे डुबाने को।
उससे ना उद्विग्न मैं होती,
सीखूॅं हुनर बच जाने को।

हालातों में दम ही नहीं है,
तोड़ सके जो मेरी हिम्मत।
लड़कर मुझसे थक जाएगा,
कोसे वो अपनी ही किस्मत।

बिगड़ा आज तकदीर हमारा,
शीघ्र ही उसे सुधारना होगा।
मेरे बुलंद हौसले से एक दिन,
हाथ मिलाकर चलना होगा।

इसीलिए फल की चिंता बिन,
अपने कर्म को करती जाऊं।
एक दिन प्रारब्ध सुधर जाएगा,
देख उसे हिय से हरषाऊं।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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