विश्व में सद्भाव का ,
परचम फहरना चाहिए।
अब किसी भी एक घर में,
गम न रहना चाहिए।

फैलाकर हर जन हृदय में,
पवित्रता को विस्तार दें।
शांति, मैत्री कर स्थापित,
जग को प्यार का उपहार दें।

विचार शक्ति को कर परिष्कृत,
देश को परिष्कृत करें।
सियासी चाल को ख़त्म करके,
देश का हम हित करें।

कर्म तू मंगल जो कर ले ,
संग तेरे होगा मंगल।
दुर्गति कभी ना छू सकेगी,
कर सकेगी ना वो दंगल।

सद्भाव नर जो भी करेगा,
चिरकाल तक सुख वो लेगा।
असंभव ना होगा कुछ भी,
व्यवधान देख उसको डरेगा।

श्रेष्ठ, तेजस्वी हे परमेश्वर!
ओत-प्रोत तुझसे सारा जग है।
जीव मात्र का जीवन तुझसे,
सुख- स्वरूप प्रभु सदा जगमग है।

अस्तित्व एक ही रवि- शशि का है,
पूरे जग में ये ही दिखते।
गात विविध परमेश्वर एक हैं,
विविध रूप धर ये हैं टिकते।

जाति- धर्म की तोड़ दीवारें,
मानव धर्म को हम अपना लें।
पर दुख- सुख का अनुभव करके,
आत्मोत्सर्ग का हम गहना लें।

मनुष्य -मनुष्य में भेद करो ना,
इनसे ना तुम करो दुराव।
ना परमपिता को दोष लगाओ,
कभी करो ना बैर का भाव।

यदि मानव से बैर किए तो,
परमात्मा सा इसको मानो।
नर में ही नारायण बसते,
इस परम सत्य को जानो।

मानव तन का तभी है कीमत,
भरी हो इसमें जब नैतिकता।
अनैतिक कार्य जो मनुज है करता,
ना बचता उसमें सात्विकता।

पुनरूत्थान करो संस्कृति का,
अपनी सभ्यता को करो जीवंत।
कभी किसी से विद्रोह करो ना,
कभी, मानवता का ना हो अंत।

तन- मन को तुम स्वच्छ बनाओ,
स्वच्छ समाज का करो निर्माण।
देवत्व का उदय मनुष्य में होवे,
पूरी वसुधा का होवे त्राण।

सात्विक कर्म सदा तुम कर लो,
नवयुग का कर लो निर्माण।
दनुजता धरा से मार भगाओ,
निष्प्रयोजन ना हो, संकट में प्राण।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *