कहने को तो आज हम आधुनिक हो गए हैं, किंतु यदि हम सही मायने में देखें तो आज हम आधुनिकता की परिभाषा से ही वंचित हैं। हम जानते ही नहीं हैं कि वास्तव में आधुनिकता है क्या? हम सिर्फ़ पाश्चात्य रहन-सहन को ही आधुनिकता की परिभाषा मान बैठे हैं। किंतु, यदि हम बात करें विचारों में आधुनिकता लाने की तो वहांँ पर हममें से ज़्यादातर लोग आज भी रूढ़िवादी परंपराओं में ही जकड़े हुए हैं, और उन परंपराओं की वज़ह से जो सबसे प्रभावित रिश्ता है, जिस रिश्ते की सबसे अधिक बात होती है वह सास- बहू का रिश्ता। आज भी यदि हम बहुधा घरों में झांँककर देखें तो पाएंँगे कि यदि कहीं पर सास मांँ जैसी है तो बहू उसका जीवन दुश्वार कर दी है, और यदि बहू बेटी बनकर रहना चाहती है तो सास घर का आया बनाकर रखी हैं। विरले घर ऐसे होंगे जहांँ पर सास यह समझती हो कि बहू एक मांँ को छोड़ कर आई है तो मुझे उसकी दूसरी माँ बनना है, और बहू भी यह समझें कि मैं एक माँ को छोड़ कर आई हूंँ तो यह मेरी दूसरी मांँ हैं। हमें इन्हें अपनी माँ की तरह ही आदर- सम्मान और प्यार देना चाहिए कुछ ऐसे ही हाव- भाव से ओत-प्रोत है मेरी आज की कविता –
सास और बहू और ससुराल

रंगहीन वह जीवन होता,
जिसका ना होता ससुराल।
खुशियों हेतु दर-दर हैं भटके,
होता उसका बुरा है हाल।

माँ को उसने छोड़ दिया है,
सास के रूप में मिलेंगी वो।
पर उन्होंने ना अपनाया,
माँ अब किसको कहेंगी वो।

दिन- दुपहरिया, रात
तीजहरिया,
मन ना कभी अच्छा होगा।
सिसक- सिसककर रोएगी वो,
जैसे छोटा बच्चा होगा।

करवट बदल -बदल कर बच्चा,
सुबक-सुबककर रोती है।
मांँ की याद में दिन भर घुटती,
सास अश्क ना पोंछती हैं।

हॅंसी-खुशी, मस्ती अठखेलियांँ,
सारे हो गए सपने अब।
मांँ के प्यार के लिए तरसती,
मांँ का प्यार मिलेगा कब?

ना कोई मन की बात है सुनता,
ना उसकी अच्छाई गुनता।
बेगाने सा व्यवहार सब करते,
ना कोई उसकी बात
समझता ।

कल की कली मुरझा है गई,
फूल ना वो कभी बन पाई।
सावन भादो सी अखियाॅं बरसें,
किस्मत से अब ठन है गई।

कोई जायका ना जीवन में,
मकसद ना ही बचा कोई।
सारे सपने टूट गए हैं,
जिसे चाहा छ़ल है किया सोई।

मायके की थी नन्ही गुड़िया,
पापा की राजकुमारी थी।
बहना की आंँखों का तारा,
भाई को बड़ी प्यारी थी,

सारे रिश्ते अब झूठे हैं,
ना कोई प्यार जताता है।
तन व मन में दर्द है उठता,
कोई समझ न पाता है।

सास के बिन घर-घर ना लगता,
बहू के बिन सब सूना है।
दोनों मिल जब घर में चहकें, खुशी हो जाति दूना है।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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