आओ, एक दिन की मैं बात बताऊं ,
स्वामी रामतीर्थ की कथा सुनाऊं।
एक दिन कक्षा में वो आए,
छात्रों को नया पाठ पढ़ाए।

बुद्धि परीक्षण आज तुम्हारा,
करता कौन है वारा न्यारा।
प्रश्न किए वो कई छात्र से,
संतुष्टि ना मिली किसी पात्र से।

खींचे श्यामपट्ट पर रेखा एक,
बिना मिटाए‌ लघु करो रेख।
दिया कुशाग्र बुद्धि बालक एक सीख,
पहली से बड़ी रेखा दिया खींच।

बिना मिटाए कर दिया छोटा,
ना कोई हरकत किया वह खोटा।
रामतीर्थ हुए बड़े प्रसन्न,
हुए छात्र के अति आसन्न।

रीत यही बच्चों अपनाना,
दूजे से तुम बड़ा बन जाना।
मन में ना कभी रखना द्वेष,
कभी न करना किसी से क्लेश।

सहकर्मी को ना कभी धकेलना,
उससे अधिक परिश्रम करना।
ख़ुद ही ऊपर उठ जाओगे,
सबके चहेते बन जाओगे।

प्रयास सदा तुम सक्रिय करना,
निष्क्रिय बनकर ना कभी रहना।
शक्ति, सहनशक्ति हो पास
बच्चों ना कभी होगे उदास।

आज की शिक्षा बड़ी गूढ़,
इसे न समझे अज्ञानी, मूढ़।
मानव जीवन भी रेखा जैसी,
सूक्ष्म दृष्टि से दिखेगी ऐसी।

मानव जीवन, सृष्टि कर्ता की
खींची लकीर,
उच्च वर्ग हो, या हो कोई फ़कीर।
अपनी रेखा बड़ी बना लो,
ना दूजे से खुन्नस पालो।

कभी दूजे को नहीं मिटाओ,
अपनी मेधा प्रबल बनाओ।
स्वयं बड़े तुम बन जाओगे,
विश्व फलक पर तुम छाओगे।

साधना शाही ,वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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