शूल दिया 1947,
कितने मोहरे में बटे थे।
द्रवित हुआ था अंत उनका,
दर्द उनकी आज भी घट नहीं।

उनमें से एक तारिक फतेह अली थे,
20 नवंबर 1949 में जन्मे।
करांची ,पाकिस्तान देश था
उनका ,
भारत भक्ति में नहीं थमे।

पाकिस्तानी कनाडाई
योगदानकर्ता थे,
लेखक और बेबाक वक्ता थे।
देश ,समाज को संगठित
करते,
मानो दीन -दुखी के वो भर्ता थे।

सामाजिक न्याय, अंतर्राष्ट्रीय संबंध,
उनके लेखन के मुख्य विषय थे।
मानवाधिकार की रक्षा छूट न जाए,
इस हेतु वो सदा विलय थे।

मानवता कल्याण की खातिर,
यूनिसेफ ,विश्व आर्थिक मंच,
विश्व स्वास्थ्य संगठन ,
जैसे संगठनों में सहयोग दिए।
लोकतांत्रिक दल को दिए समर्थन,
लोक कल्याण का कार्य किए।

उनके मत को बहुतेरे करें अनुसरण,
अपना आदर्श बनाए हैं।
अग्रणी सोशल मीडिया प्रभावकारी हैं मानते,
बहुतों के घर में दिए जलाए हैं।

पाकिस्तान ने घाव दिया था,
राजद्रोह था थोप दिया।
एक सच्चे मानव के मानो,
पीठ में खंजर भोंक दिया।

ताल ठोक वो जग में कहते,
पाकिस्तान में मैं था जन्म लिया।
पर एक सच्चा भारतीय हूॅं,
इन्होंने ना कोई गम है दिया।

इस्लामी पंजाबी शेर थे,
कनाडा में वो अप्रवासी थे।
देश-विदेश में घूमे -फिरे ,
पर एक सच्चे भारतवासी थे।

दुख – बाधा लंबी थी घेरी,
कैंसर आकर उनको घेरा था।
24 अप्रैल 2023 सोमवार को,
यम ने डाला डेरा था।

डाले डेरा ना गए वापस ,
साथ फतह को ले के गए।
मानवता की सच्ची मूर्ति थे,
अनगिनत आंखों में आंसू देके गए।

नुसरत कहती ना पाकिस्तानी,
हिंदुस्तान के लाल थे वो ।
मूल रूप से थे पाकिस्तानी,
पर हिंदुस्तानी कमाल के वो।

बात सदा बेबाक थे करते ,
एक अच्छे सूफ़ी कव्वाल थे वो।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली थी,
किए ना कभी मलाल थे वो।

आज इनके जाने से ,
मानवता भी रो है रही।
क्षतिपूर्ति जिसकी हो मुश्किल,
ऐसी हस्ती खो है रही।

रात बड़ी गमगीन थी ,
दिन भी ना लगता उजास है।
तारिक फतेह अली की गज़लें,
मानो घूमती आस-पास हैं

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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