प्रसन्ना की बेटी रिया को करीब एक सप्ताह से तेज़ बुखार आ रहा था। उसके पति रिया को एक अच्छे बाल रोग विशेषज्ञ से दिखा कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर गाॅंव में घर बनवाने में लगे थे , जहाॅं उनके सेवानिवृत्त पिता को उनकी माॅं के साथ रहना था।उस दवा से रिया को बिल्कुल भी आराम नहीं हो रहा था।पर पति से कहने पर वो आग बबूला होते हुए कहते, दिखा तो दिया हूॅं, डॉक्टर कोई जादूगर थोड़े ही है धीरे-धीरे ही आराम होगा। किंतु, बेटी को तनिक भी आराम नहीं हो रहा था।
बुखार आने का पाॅंचवा दिन था घड़ी शाम के 5:00 बजा रही थी। सभी घरों में लोग शाम के चाय- नाश्ते की तैयारी में लगे थे, तभी अचानक प्रसन्ना की बेटी रिया बेहोश हो गई। प्रसन्ना को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, उसे घर से बाहर जाने की भी इजाज़त नहीं थी, लेकिन कहते हैं न खुद का दुख माॅं काट लेती है, पर जब बच्चा दुखी होता है तो यह दुख एक माॅं के लिए बर्दाश्त करना मुश्किल होता है, बच्चे को दुख में देखकर माॅं किसी भी सीमा रेखा को पार कर जाती है ,प्रसन्ना के साथ भी यही हुआ ।वह ख़ुद के लिए बंदिशों में रहना स्वीकार कर ली थी, कभी उफ़ तक नहीं की,किंतु बात जब उसकी बेटी पर आई तब वह उन बंदिशों को तोड़कर नीचे शालिनी के यहाॅं मदद के लिए चली गई।वह शालिनी का दरवाज़ा खटखटाई, उन्होंने दरवाज़ा खोला तो प्रसन्ना को देखकर अवाक रह गए क्योंकि वह कभी नीचे नहीं उतरती थी। शालिनी ने घबराते और हड़बड़ाते हुए प्रसन्ना से पूछा क्या हुआ भाभी जी सब ठीक तो है! प्रसन्ना शालिनी को देखकर हड़बड़ाते हुए वो रिया—,वो रिया—–के आगे कुछ भी बोल नहीं पा रही थी। प्रसन्ना की स्थिति को देखकर शालिनी को यह समझते देर नहीं लगा कि शायद रिया को कुछ हो गया है। शालिनी प्रसन्ना के साथ भागते हुए ऊपर आई, आकर जो नज़ारा देखी तो उसे देखकर पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। रिया का शरीर निस्प्राण सा पड़ गया था। प्रसन्ना रिया को उठाई, उसके सीने को बार-बार दबाई, उल्टा करके पीठ ठोंकी लेकिन उसके शरीर में कोई भी हलचल नहीं हो रही थी। शालिनी के शरीर में चीरो तो ख़ून नहीं, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह प्रसन्ना को क्या बताए! लेकिन तभी शालिनी को महसूस हुआ रिया ने अपना हाथ हिलाया,हाॅं रिया ने हाथ हिलाया! वह ध्यान से देखने लगी हाॅं रिया रुक- रुक कर अपने अंँगुलियों को हिला रही थी। शालिनी को विश्वास हो गया नहीं कुछ भी बुरा नहीं होगा, कुछ भी बुरा नहीं होगा। शालिनी दौड़ती हुई नीचे गई, नीचे जाकर सो रहे अपने पति को सारा हाल बताई ,उसका पति शांतनु भी दौड़ते हुए ऊपर आया और रिया को लेकर दोनों पति-पत्नी पास के ही एक अच्छे बाल रोग विशेषज्ञ के यहाॅं गए। वहाॅं उन्होंने रिया को डॉक्टर को दिखाया और जब रिया होश में तथा ख़तरे के बाहर हो गई तब लेकर रात में घर आए। जब शालिनी और शांतनु डॉक्टर को दिखा कर रिया को लेकर घर आ गए। घर आने पर पूरा आस-पड़ोस वहाॅं पर जमा हो गया था और उसी भीड़ में प्रसन्ना के पति भी हड़बड़ाते हुए,चिंतित अवस्था में वहाॅं पर अचानक अवतरित हुए। उन्हें देखते ही पूरा आस-पड़ोस उनके ऊपर टूट पड़ा। यह क्या है!आपके लिए परिवार की कोई क़ीमत नहीं है। पूरे दिन आप घर में बीवी बच्चों को अकेले छोड़कर घूमते रहते हैं, आपको पता है न कि आपकी बीवी कहीं नहीं जाती है ,अगर आज आपने जो इसके लिए लक्ष्मण रेखा खींच कर रखा था उसे तोड़कर बाहर न निकली होती तो आज आप अपनी बेटी को खो दिए होते। ऐसे घर,जमीन, प्रॉपर्टी का क्या फ़ायदा जो अपने परिवार के खुशियों और सपनों को जलाकर बनाया गया हो।

इसके पश्चात सभी लोग अपने-अपने घरों को चले गए और सबकी ज़िंदगी सामान्य हो गई। करीब एक सप्ताह पश्चात पुनः प्रसन्ना शालिनी के यहाॅं गई, दरवाज़ा खटखटाया, शालिनी ने दरवाज़ा खोला तो पूछा – क्या बात है भाभी जी सब ठीक तो है न, प्रसन्ना शालिनी के गले लग कर फफककर रो पड़ी और बोली- दीदी आपने जो मेरे लिए किया है मैं उसका क़र्ज़ जिंदगी भर नहीं उतार पाऊॕंगी। किंतु, उस दिन रिया के इलाज़ में आपने जो पैसे लगाए उसे देकर अपने मन के बोझ को थोड़ा हल्का करना चाहती हूॅं।उस दिन आप रिया को लेकर अस्पताल गईं थीं तब आपका कितना खर्च लगा था?

शालिनी ने प्रसन्ना को बैठाया, उसे सामान्य किया दोनों एक साथ चाय पीं फिर शालिनी बोली भाभी जी आप अपनी बेटी को देखिए, कोई ज़िंदगी भर की पूॅंजी नहीं लग गई है, और अगर वह आपकी बेटी है तो मानवता के नाते मेरी भी बेटी है, कोई बात नहीं आप क्या लगा, कितना लगा को लेकर बिल्कुल परेशान नहीं होइए, आप अपनी बेटी का और अपना ख्याल रखिए।

तब प्रसन्ना ने कहा- हाॅं दीदी वो तो मैं करूॅंगी, लेकिन प्लीज बता दीजिए आपका कितना लगा? आपने जो किया उसका एहसान मैं ज़िंदगी भर नहीं उतार पाऊॕंगी, लेकिन पैसे देकर अपने दिल का बोझ मैं थोड़ा सा शायद हल्का कर पाऊॅंगी। तब बार-बार पूछने पर शालिनी ने प्रसन्ना को बताया भाभी ₹3000 लगे थे। लेकिन आप उस rs.3000 को लेकर बिल्कुल भी परेशान नहीं होइए, आपकी जब मर्ज़ी हो तब दीजिएगा, नहीं भी देंगी तो भी कोई बात नहीं है। वो पैसे मैंने आपको क़र्ज़ नहीं दिए हैं, एक मासूम सी बच्ची जो देवी रुप है उस पर हमने लगाया है, वह एक तरह से मैंने माॅं को भोग लगा दिया है। शालिनी की ओर से इस तरह अपनत्व की बात सुनकर प्रसन्ना को लगा उसे एक ऐसी सहेली मिल गई है जो उसके हर सुख-दुख में उसके साथ खड़ी है। इसके लिए वह भगवान को धन्यवाद ज्ञापित कर रही थी और अंदर ही अंदर प्रसन्न हो रही थी। करीब 1 घंटे दोनों बातचीत कीं, बात-चीत करने के पश्चात प्रसन्ना ऊपर अपने कमरे में आ गई। उस दिन से दोनों की दोस्ती प्रगाढ़ होती गई दोनों एक दूसरे पर जान छिड़कने लगीं और प्रसन्ना का पति भी अब प्रसन्ना को शालिनी के यहाॅं जाने से नहीं रोकता था। ज़िंदगी आगे बढ़ती रही एक महीने के पश्चात प्रसन्ना ने शालिनी को ₹3000 वापस कर दिए, लेकिन उसके अंदर यह भाव हमेशा दबा हुआ था कि उसने पैसे वापस किए हैं, उसका एहसान कभी वापस नहीं कर पाएगी। उसे हमेशा इस बात का भान रहता था,है और रहेगा कि यदि शालिनी उस दिन वह ₹3000 और अपनी तत्परता न दिखाई होती तो प्रसन्नाअपनी बेटी रिया को खो चुकी होती। समय के साथ-साथ रिया बड़ी होती गई और जब वह 15 वर्ष की थी तब एक दिन बातों ही बातों में प्रसन्ना ने रिया को उसके बचपन उस घटना को विस्तार से बताया साथ ही यह भी बताया कि बेटा! ज़िंदगी के किसी भी मोड़ पर किसी भी तरह से यदि तुम्हारी मुलाकात कभी शालिनी आंटी से हो जाती है और तुम्हें उनके लिए कुछ करने का मौका मिलता है तो कभी भी छोड़ना नहीं क्योंकि तुम उनके लिए लाख कुछ कर लो लेकिन उन्होंने जो तुम्हारे लिए किया है तुम उससे कभी भी उऋण नहीं हो सकती हो। तुम्हारे ज़िंदगी की एक-एक साॅंसें उनकी एहसानमंद और कर्ज़दार हैं। अतः ज़िंदगी में कभी भी तुम कुछ अच्छा करना एक बार उन्हें ज़रूर याद करना और कभी भी उनके सेवा का अवसर मिले तो उसे गवाना नहीं।
इस तरह दुनिया की भीड़ में शालिनी और प्रसन्ना फिर कभी नहीं मिलीं लेकिन शालिनी आज भी प्रसन्ना के दिल में निवास करती है और प्रसन्ना आज भी इस बात को नहीं भूली है कि उसकी बेटी आज उसके सामने है तो वह शालिनी की वज़ह से।

दोस्तों हमारे जीवन में कई बार ऐसे पल आते हैं जब हम मुसीबत के समय में किसी से क़र्ज़ लेते हैं और कुछ दिनों पश्चात उस क़र्ज़ को चुकाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं, किंतु ऐसा दल नहीं होता है, हम पैसे लौटा सकते हैं वो पल नहीं। यदि कोई हमारे मुसीबत में काम आया है तो हमें उसे कभी भी भुलाना नहीं चाहिए।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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