बंदिश में जीना,
अब और मुझे गवारा नहीं।
जो अपने हैं उन्होंने,
कभी मुझको स्वीकारा नहीं।

खामी नहीं थी ऐसी,
भी कोई मुझमें।
उनकी तरह छल-प्रपंच को,
पाली नहीं खुद में।

जो ओहदा देखकर,
खुश और नाराज़ होते हैं।
अब उनके किसी भाव का,
न हम परवाह करते हैं।

जिन्हें दंभ है ,
तिज़ोरी में बंद दौलत का।
मुझे भी ज़रूरत नहीं ,
अब उनके कभी भी सोहबत का।

मै जीती हूॅं हकीकत में,
दिखावे में कभी नहीं।
मुस्कुराती हूॅं तो दिल से,
छलावे में दबी नहीं।

मेरी यंत्रणा जिसके लिए,
मात्र आडंबर है एक।
दूर रहो मेरे जीवन से,
ऐसे रिश्ते दूॅं मैं फेंक।

दर्दे दिल का बयान,
उनसे ही किया जाता है।
जिससे रक्त का नहीं,
दिल का हमारा नाता है।

संबंध रक्त का था,
दिल किंतु पत्थर का था बना।
ऐसे पत्थरों से रिश्ता नहीं,
इमारत है सदा तना।

उन अट्टालिकाओं से मेरा रिश्ता हो,
ऐसी मुझे लालसा नहीं।
पत्थरों में पत्थर हैं रहते ,
उनसे मेरा वास्ता नहीं।

अज़ीज़ होने से पहले,
दिल के क़रीब होना ज़रूरी है।
कुछ भी

कुछ बेगानों से अपनों को,
अपना कहना मज़बूरी है।

गैरों से अपनों पर हक जताना,
समझदारी कोई नहीं।
माना आज वक्त तुम्हारे साथ है ,
किंतु तुम ही सदा के अधिकारी कोई नहीं।

अरे! हम तो वो नगीना हैं,
जो हर जगह फिट हो जाते हैं।
ज़िंदगी शूल दे या फूल,
उसे सामान्य भाव से स्वीकारते हैं।

जिंदगी के आगे,
हाथ सदा वो ही हैं फैलाते।
जिन्हें फूलों की आदत है ,
शूल देख के जो घबराते।

जिन्हें ज़रूरत नहीं हमारी,
उनका साथ, भला हम क्यों निभाएं?
वो अपनी गली जाएं,
हम अपनी राह जाएं।

अपनी गली वो खुश हैं,
अपनी गली हम खुश।
वो बाॅंटते हैं नफरतें,
हम लेते समझ के कुश

साधना शाही,वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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