यदि हम आज से दो दशक पूर्व की बात करें तो दिव्यांग जनों को बड़े ही हेय दृष्टि से देखा जाता था, किंतु आज समय परिवर्तित हो गया है।आज हमारे समाज में रहने वाले दिव्यांग जनों को सम्मानपूर्वक एवं मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार को बढ़ावा देने के लिए प्रतिवर्ष “विश्व विकलांग(दिव्यांग )दिवस” एक विशेष उद्देश्य एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस उत्सव के माध्यम से विश्व के सभी विकलांग जनों को समाज में एक सम्माननीय स्थान दिलाने हेतु तथा उन्हें समाज के मुख्य धारा में शामिल करने हेतु विविध प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

यदि हम अल्पसंख्यक समुदाय की बात करें तो विश्व का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय दिव्यांग जनों का है। ऐसे में दिव्यांग जनों के उत्थान हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ प्रतिवर्ष विश्व विकलांग (दिव्यांग )दिवस मनाता है।

विकलांग लोगों को समाज में सम्मान देने हेतु ही 27 दिसंबर 2015 को अपने रेडियो कार्यक्रम “मन की बात” में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा विकलांग जनों को “विकलांग” शब्द की बजाय “दिव्यांग” शब्द से सम्बोधित करने की घोषणा की गयी थी। इसके पश्चात भारत सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से विकलांग जनों के लिए “दिव्यांग (Divine body part)” शब्द का प्रयोग किया जा रहा है।

प्रतिवर्ष “अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस” के लिए कोई न कोई थीम निर्धारित किया जाता है इस वर्ष3 दिसंबर 2023 के “अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस” का थीम “समावेशी विकास हेतु परिवर्तनकारी समाधान” रखा गया है। इसके माध्यम से अन्वेषण के उपयोग द्वारा विकलांग जनों के जीवन को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

तो आज “अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस” के पावन अवसर पर आज की मेरी कविता इन दिव्यांग जनों को समर्पित आज की कविता-

दिव्यांग के अंतर्मन की आवाज”

साहस की है कमी न हममें,
ना समझो कि हम मायूस हैं।
तुम अपने को श्रेष्ठ न समझो,
ना समझो हम घास- फूस हैं।

प्रतिभा हममें गज़ब भरी है,
हम भी गगन को छू सकते हैं।
हम हौसले के फलदार वृक्ष हैं,
निराश हो कभी न चू सकते हैं।

अरमानों का भरकर बक्सा,
धीमे-धीमे हम चलते हैं।
फिर भी हमको कम नहीं आँको,
निश्चित ध्येय से ना हम टलते हैं।
हम भी उड़ेंगे नील गगन में,
हम तो एक श्रेष्ठ फानूस हैं।

साहस की है कमी न हममें,
ना समझो हम मायूस हैं।
तुम अपने को श्रेष्ठ न समझो,
ना समझो हम घास- फूस हैं।

माना तुमको पंख मिले हैं ,
पर हमको भी कम ना आँको।
धीरे-धीरे ही हम पहुंँचेंगे,
हमको समझ तुम, तम ना ताको।

तुम पूनम यदि ख़ुद को कहते,
हम कार्तिक, कृष्ण, अमावस हैं।
तुम खु़द को मधुमास जो समझो,
तो हम भी तो रिमझिम पावस हैं।

हांँ, हम तुमसे कुछ मद्धिम हैं,
पर दया का तुम हमें पात्र न समझो।
हिम्मत, साहस की कमी नहीं है,
हमको तुम अक्षम छात्र न समझो।
परम, पुण्यकारी जिसे मानें,
हमतो वो पावन नाकूस हैं।

साहस की है कमी न हममें,
ना समझो हम मायूस हैं।
तुम अपने को श्रेष्ठ न समझो,
ना समझो हम घास- फूस हैं।

ग़लती से तुम कभी भी हमको,
काली कोठरी नहीं समझना।
आत्मा की आंँखों से दुनिया देखें,
हमसे कभी तुम नहीं उलझना।

हम ही तो हैं हेलेन केलर,
हम ही अरुणिमा सिन्हा हैं।
गिरीश रूप में खेले बैडमिंटन,
हमने सुधा चंद्रन नर्तकी दीन्हा है।

पैरा एथलीट मलाठी हैं हम,
हम सीईओ रामाकृष्णन हैं।
दिव्यांगता को अभिशाप न समझो,
हम वाक विकारी अभिषेक बच्चन हैं।
कभी उपेक्षित करो हमें ना,
हम सुखद प्रातकाल प्रत्यूष हैं।

साहस की है कमी न हममें,
ना समझो हम मायूस हैं।
तुम अपने को श्रेष्ठ न समझो,
ना समझो हम घास- फूस हैं।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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