मोहिनी स्टाफ रूम में बैठकर अपना काम करने में ताल्लीन थी तभी किसी के आने की आहट मिली। उसने पलकों को थोड़ा सा ऊपर उठाया और देखा तो एक बड़ा ही आकर्षक व्यक्तित्व वाला व्यक्ति आया और उसके सामने वाली खाली कुर्सी पर बैठ गया। मोहिनी ने पल भर के लिए उसे देखा और न जाने किन ख्यालों में खो गई। उसके पश्चात पलकें झुकाकर अपने कार्य में तल्लीन हो गई।

बाद में मोहिनी को पता चला कि वह व्यक्ति जिसका नाम ऋषभ था वह उस विद्यालय के अध्यक्ष का संबंधी है। उसके बारे में जानकारी मिलते ही मोहिनी ने अपने मन को समझा लिया कि मोहिनी और ऋषभ के बीच धरती आसमान का अंतर है। अतः उसके मन को ऋषभ की तरफ़ बिल्कुल भी आकर्षित नहीं होना चाहिए।

मोहिनी एक छोटे से गांँव की सामान्य वर्ग की पढ़ी-लिखी सुंदर, सुशील, कर्मठ लड़की थी। उसकी आंँखों में अनेक सपने तैर रहे थे। वह उन सपनों को यथाशीघ्र पुष्पित- पल्लवित होते हुए देखना चाहती थी।

किंतु यह सब इतना भी आसान नहीं था। क्योंकि आज की आधुनिक शिक्षा दीक्षा, आधुनिक तकनीक से मोहिनी क़रीब- क़रीब अनभिज्ञ सी थी।

किंतु, वह अपने आप को समय के साथ अपडेट करने के लिए अथक परिश्रम करती। उसके परिश्रम और मृदुल व्यवहार की वज़ह से बहुत जल्द ही पूरे कर्मचारियों में सबकी चहेती बन गई। लेकिन उन सब में ऋषभ के लिए उसके मन में एक अलग ही जगह थी। शायद वह ऋषभ को दिल दे बैठी थी। लेकिन इस बात की भनक वह पूरे विद्यालय में किसी को भीनहीं लगने दी थी। यहांँ तक कि ऋषभ को भी नहीं।

दूसरी तरफ ऋषभ भी मोहिनी के सरलता, कर्मठता, तल्लीनता, सहजता को देखकर मन ही मन मोहिनी को पसंद करने लगा था। लेकिन कभी भी अपने प्यार को जाहिर नहीं होने दिया। उसे डर था कि कहीं मोहिनी उसे ग़लत न समझ ले।

समय का पहिया चलता रहा ऋषभ को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई और वह विद्यालय छोड़कर मेरठ चला गया। मोहिनी इसी विद्यालय में कार्यरत थी। 2 वर्ष पश्चात विद्यालय के बहुत सारे शिक्षकों का प्रमोशन हुआ और विद्यालय मैनेजमेंट की तरफ़ से शिक्षकों के लिए एक पार्टी की व्यवस्था की गई थी। उस पार्टी में कुछ शिक्षकों को सम्मानित किया जाना था और सम्मानित किये जाने वाले शिक्षकों में एक नाम मोहिनी का भी था। मोहिनी बहुत ख़ुश थी ऐसा लग रहा था उसके सपनों को पंख मिल गया हो। वह बैठकर पार्टी इंजॉय कर रही थी तभी उसकी आंँखें एकटक देखती रहीं, देखती रहीं और बस देखते ही रह गईं।

आखिर कौन था वो? तभी उसने देखा वह व्यक्ति जिस पर उसकी आँखें टिक गई थी
हाथों में एक गुलदस्ता लेकर उसकी ही तरफ़ बढ़ता चला आ रहा है और बढ़ते बढ़ते उसके बिल्कुल क़रीब आकर खड़ा हो गया। उसके बाद उसने मोहिनी का हाथ पकड़ा उसे स्टेज पर ले गया। स्टेज पर ले जाकर उसने मोहिनी को गुलदस्ता दिया और अपने प्यार का इज़हार किया।

ऋषभ के मुंँह से अपने लिए प्यार की बात सुनकर मोहिनी ने सिर्फ़ हाँ में सर झुका दिया और मुस्कुराती रही और इस तरह से उसने भी अपने प्यार की मूक सहमति दे दिया। किंतु उसके अंदर एक तूफ़ान चल रहा था। उसे डर था कि यदि उसके माता-पिता को मोहिनी और ऋषभ के रिश्तों की बात पता चली तो घर में बवाल हो सकता है।

किंतु ऋषभ यहांँ आने से पूर्व ही मोहिनी के माता-पिता से मिलकर अपने और मोहिनी के रिश्ते की बात कर चुका था। लेकिन वह मोहिनी को सरप्राइज देना चाहता था।

मोहिनी डरे हुए नीचे सर झुका कर खड़ी थी कि तभी मोहिनी और ऋषभ दोनों के माता-पिता वहांँ आए और दोनों को परिणय सूत्र में बांँधने की घोषणा कर दिये। और इस तरह से वह जो पार्टी विद्यालय के शिक्षक- शिक्षिकाओं के लिए थी उस पार्टी में मोहिनी और ऋषभ एक रिश्ते में बँध गए। कुछ समय पश्चात दोनों की धूम-धाम से शादी हो गई।

मोहिनी ऋषभ के घर की दुल्हन, लक्ष्मी, बहू बनकर गई। और उसे परिवार में इतना प्यार और दुलार मिला कि उसके आंँखों में जो भी सपने थे वो सारे सपने पूरे हो गए। और इस तरह से एक अजनबी ने मोहिनी के जीवन को खुशियों से भर दिया।

इस तरह एक अजनबी मोहिनी के जीवन का अभिन्न अंग और उसकी ख़ुशी बन गया था।

साधना शाही, वाराणसी

By Sadhana Shahi

A teacher by profession and a hindi poet by heart! Passionate about teaching and expressing through pen and words.

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